सुनो-सुनो ए भारत की नारी , नहींं रही अब तु बेचारी
क्यों जन्म से पहले ही कोख में बेटी को मार जाता है ।
तुम भी तो एक बेटी हो तभी गर्भ धारण करने
का सौभाग्य मिला , कर्ज़दार हो उस इश्वर के
जिसने तुम्हें इस लायक समझा ।
मां को तो जन्म देने का अधिकार दिया ईश ने
अजन्मी बेटी को मारने का हक तुम कहां से ले आए ।
जो कहते बेटी महमान है , ग़र चली जाती है बेटी
तो क्या बेटे रूख़्सत नहीं होते , छोड़ कर उनके जाने
पर क्या उनके माँ-बाप नहीं रोते ।
बेटी सयानी होने पर अब किसी बाप के कँधे नहीं झुकते
अब तो बेटियां लहराती है परचम गर्व के , तोड़ देती है दम्भ
दरिन्दो ,लोभियों के ।
ग़र मारोगे कोख़ मे बेटी ,बहु कहाँ से लाओगे ।
बेटी को जीने का अधिकार दे दो , बस थोड़ा सा उसे प्यार दे दो ।
ग़र कर नहीं सकते तुम रक्षा बेटी की, दे नहीं सकते जीने का अधिकार उसे
तो किस हक से बालिका दिवस मनाते हो,
करते हो कन्या का पूजन मान देवी उसे उसके भक्त बन जाते हो।
एक तरफ तो करते पूजा बेटी की,
मगर दूजे की बेटी पर रख बुरी नज़र उसे फूल जैसा मसल डालोगे
तो भला अपनी बेटी की रक्षा कैसे कर पाओगे।
एक दिन गर्ल चाइल्ड डे मनाने से क्या होगा,
भला साल भर की अजन्मी कत्ल हुई, बलात्कार की शिकार,
तेज़ाब से जली बेटियों को क्या जीवन दे पाओगे।
ग़र नहीं तो छोड़ दो ढोंग ये (बेटी दिवस ) गर्ल चाइल्ड डे मनाने का। 🙏🏻
मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर)

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