Monday, December 28, 2020

उपर वाला कमरा- प्रेम बजाज




राजेश महरोत्रा एक नामी कपड़े के व्यापारी , मुम्बई में अच्छा बड़ा कपड़ों का शोरूम , इकलोता बेटा है साहिल , इसलिए उसकी हर ख्वाहिश पुरी की जाती ।
वो कुछ समय अमेरिका रहना चाहता है , इसलिए राजेश महरोत्रा उसे अमेरिका भेज देते हैं , यहां का बिजनेस राजेश जी देखते हैं , नौकरी की फौज तो है ही साथ में , बस इश्वर की कृपा से सब बहुत बढ़िया चल रहा है ।
आज लगभग एक साल होने को आया , राजेश जी बहुत परेशान हैं ।
कारण ..... उनके घर में एक लड़की राधा लगभग 18 --- 19 साल की काम करती थी , दिन-रात यही राजेश जी के घर पर ही रहती थी , बहुत नेक , मेहनती और अच्छी लड़की थी ।
ना जाने क्या हुआ एक दिन उसने आत्महत्या कर ली । तब से राजेश जी बहुत परेशान हैं कि राधा ने आत्महत्या क्यों की ।
जिस समय सुबह-सुबह आ के राजेश जी की बीवी रश्मि ने आकर बताया कि राधा ने आत्महत्या कर ली , राजेश जी हड़बड़ा कर उठे और सबसे पहले उन्होंने पुलिस को फोन किया , और थोड़ी ही देर में पुलिस आ गई और तहकीकात शुरू हो गई , लेकिन अभी तक राधा की आत्महत्या का मामला सुलझा नहीं ।
राजेश महरोत्रा का आलीशान घर , तीन बैडरूम वाला , उपर दो कमरे बने हैं , पीछे बैकयार्ड में सर्वेंट क्वार्टर हैं । एक क्वाटर में एक परिवार रहता है ।
राधा के माता-पिता कहीं दूर गांव में रहते हैं , वो राजेश जी के घर पर रहती है इसलिए अकेली होने की वजह से उसे क्वाटर में नहीं रखा गया , उसे रहने को उपर वाला कमरा दे दिया गया ।
रोज़ सुबह-सुबह 6 बजे राधा आकर रश्मि को चाय देती थी , लेकिन उस दिन सूरज सर पर चढ़ आया सात बज गए चाय नहीं आई , तो रश्मि ने राधा को आवाज़ लगाई , लेकिन कोई उत्तर ना पाकर रश्मि उपर उसे देखने चली गई कि आज तक ऐसा नहीं हुआ , कि राधा इतनी देर तक सोती रहे , शायद तबीयत ख़राब हो ।
जाकर दरवाजा खटखटाने लगी तो देखा दरवाजा खुला था और राधा बिस्तर पर बेसुध पड़ी थी , बहुत बुलाने पर ,हिलाने - डुलाने पर जब राधा ने कोई प्रतिक्रिया नही की तो रश्मि  का दिल धक-धक करने लगा , एक अनजानी शंका ने घेर लिया , और वो जल्दी से नीचे आई और महरोत्रा जी को जगाया और राधा के बारे में बताया ।
महरोत्रा जी ने उसी पल पुलिस को फोन कर के बुला लिया , पुलिस आई और लाश को पोस्टमार्टम के लिए लेजाया गया , लेकिन आज एक साल से  राधा का केस ज्यूं का त्यूं है कोई नतीजा नहीं निकल पा रहा , राधा के मां- बाबा रोज़ शहर आ- आ कर थाने के चक्कर काट कर थक गए ,लेकिन कुछ पता नहीं चल रहा कि राधा ने आत्महत्या क्यों की ।
दो साल पहले राधा को उसके मामा गांव से लाए थे जो राजेश जी के शोरूम में काम करते थे , बोले .... साहब किसी काम पे रख लो , चार पैसे भी कमा लेगी , कुछ ढंग के तौर-तरीके भी सीख लेगी । तो राजेश जी ने बीवी से सलाह  मशवरा करके उसे घर पर रख लिया । घर में वैसे तो दो - तीन  नौकर  थे ही , मगर ये भी घर का काम अच्छे से देख लेती थी , इसके आने से रश्मि को बहुत आराम मिला था , रश्मि का लगभग सारा काम राधा सम्भाल लेती थी ।
सुबह-सुबह रश्मि को चाय देना , फिर नाश्ते में मदद कराना , इस तरह से रश्मि को काफी सहारा मिल जाता था । अब रश्मि को आने - जाने की भी परेशानी नहीं रही , वो जानती थी उसके घर ना होने पर रश्मि सब संभाल लेगी ‌।
लेकिन इस समय रश्मि का भी चिंता से बुरा हाल था , उसे समझ नहीं आ रहा कि राधा की आत्महत्या का कारण क्या है ,  वो राजेश से रोज़ पुलिस से बात करने को कहती कि पुलिस किसी नतीजे पर क्यों नहीं पहुंच रही कि ये हत्या है या आत्महत्या , और क्यूं और कैसे ? 
राजेश का बेटा साहिल  भी अमेरिका से अब वापिस आ गया ,उस की शादी की चर्चा चल रही है , घर में अब राधा की जगह दूसरी नौकरानी  शीतल  रखी गई है , राधा वाला कमरा उसे दिया गया  । 
साहिल  की शादी तय हो गई , और  धुमधाम से शादी हुई । साहिल हनीमून से लौट कर अपने पापा राजेश जी का बिजनेस संभाल लेता है , घर में दो सदस्य आने से घर की रौनक बढ़ गई है लेकिन रश्मि को चैन नहीं , रह - रह कर उसे राधा का ख्याल आता है , और एक दिन वो खुद पुलिस के पास जाती है , राधा के केस के बारे में जानने के लिए ।
 " इंस्पेक्टर , क्या अभी तक राधा के बारे में किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे आप लोग , आखिर हुआ क्या था ? हत्या या आत्महत्या ? और क्यूं और कैसे हुआ ये सब ? 
" मिसेज महरोत्रा आप  बेवजह परेशान हो रही है , जब कुछ सुराग ही नहीं मिला तो हम क्या कर सकते हैं ।
निराश हो कर रश्मि घर वापिस आ जाती है ।
और एक दिन  सुबह शीतल पुलिस को फोन कर के बुलाती है ,और पुलिस  को राजेश जी को अरेस्ट करने को कहती हैं ।
मिसेज महरोत्रा.... शीतल ये सब क्या है , तुम्हारी इतनी हिम्मत कि तुम अपने देवता जैसे मालिक को अरेस्ट करने के लिए कह रही है । "
इंस्पेक्टर भी शीतल से ....  तुम इस घर की नौकरानी हो और अपनी औकात में रहो , मालिक के बारे में बोलने से पहले कुछ तो सोचा होता ।
माफ़ किजिए महरोत्रा साहब इसने हमें झूठ  से कह दिया कि आप ने बुलाया है , राधा के बारे में कुछ बात करनी है , हम आप का फोन भी ट्राई कर रहे थे , लेकिन आप कि फोन भी नहीं लग रहा था , इसलिए हम चले आए , शीतल जाओ और अपना काम करो ।
राजेश महरोत्रा अवाक् से ये सब देख - सुन रहे हैं , उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा कि ये सब क्या हो रहा है ।
शीतल अपना आई. कार्ड दिखाती है  जिसे देख कर इंस्पेक्टर उसे सेल्यूट करता है , राजेश जी पूछते हैं कि ये सब क्या है , तब शीतल बताती है कि वो ही. आई. डी. इंस्पेक्टर है , और राधा केस की छानबीन करने आई है ।
इंस्पेक्टर... " लेकिन मैडम हमारे पास ऐसी कोई इंफॉर्मेशन नहीं थी । 
"" क्योंकि आप सब महरोत्रा जी के साथ हैं , हमें उपर से आर्डर था कि केस की छानबीन गुप्त तरीके से हो , और आप लोगों को किसी को भी कुछ नहीं बताना । 
"" तो मैडम क़ातिल कौन है ?
" राजेश महरोत्रा 
इंस्पेक्टर और राजेश महरोत्रा दोनों अवाक से इंस्पेक्टर शीतल को देखते  हैं ।
शीतल सारी कहानी बताती है ... कि राधा इनके घर पर अच्छे से काम कर रही थी , रश्मि उसे बेटी जैसे समझती थी , इसलिए कभी - कभी रश्मि को कहीं जाना होता तो राधा घर संभाल लेती थी , एक बार रश्मि का भाई बीमार था और रश्मि मिलने गई , उसे वहां तीन - चार दिन लग गए ।
पीछे से राधा और राजेश जी अकेले थे , रात को जब आने के बाद राधा अपने कमरे में जाकर सो गई तो अचानक राजेश जी को याद आया कि कल उन्हे किसी काम से सुबह जल्दी जाना है तो वो राधा को ये कहने उसके कमरे में गए कि सुबह जल्दी उठ कर नाश्ता बना दे , लेकिन जब वो कमरे में गए तो राधा गहरी नींद में थी और उसे इस तरह से सोया देख राजेश के अन्दर भी काम अंगड़ाई लेने लगा , और वो राधा के करीब लेट गया और उसे बाहों में भर लिया , मजबूत पकड़ में आने के कारण राधा की नींद टूटी , पहले तो उसने खुद को छुड़ाने की कोशिश की , मगर चढ़ती जवानी वो भी बहक गई और आत्मसमर्पण कर दिया , और दोनों बह गए काम के वेग में , दोनों को लत लग गई एक दूसरे की , जब भी मौका देखते काम पिपासा बुझा लेते , राधा के अन्दर एक जीव  सांसे लेने लगा था ,  राजेश ने वादा किया था कि रश्मि को तलाक देकर ,उसे घर , पैसा , प्यार, सब देगा वो  चहकने लगी थी और इसी चहक में वो एक गलती कर गई  , पड़ोस की बाईं मीरा से उसकी अच्छी दोस्ती थी , और वो बातों- बातों में उसे बता गई ।
और एक दिन  रश्मि मार्केट गई थी तो राधा ने राजेश को घर बुलाया और कुछ पेपर साइन करने को कहा , जिसमें उसकी प्रोपर्टी की आधी की उसका आने वाला बच्चा मालिक  होगा , राजेश जी ने उसे कहा कल वो अपने वकील को बुला कर कोई ना कोई फैसला कर देंगे । मामला आर या पार कर देंगे , राधा बहुत खुश थी उस दिन, उसने मीरा को भी बताया ।
और रात को राजेश जी ने उसका गला घोंट कर मार डाला , किसी को कानों-कान खबर नहीं हुई ।
लेकिन मीरा ने अपनी मालकिन को सब बताया तो उन लोगों को शक हो गया और उन्होंने अपना शक ज़ाहिर किया , और पुलिस चोकन्नी हो गई , मैं सी. आई. डी. इंस्पेक्टर आपके घर में नोकरानी बन कर आई ताकि मैं घर में रह कर जानकारी हासिल कर सकूं , उपर वाले कमरे में से एक फोटो के पीछे मुझे एक डायरी मिली , जो राधा कभी कभी लिखती थी , उस दिन भी उसने उस डायरी में सब कुछ लिखा था , जिसमें उसने यह भी लिखा है कि आप कल मैडम को तलाक देकर  उसे ओर उसके होने वाले बच्चे को जो आपके प्यार की निशानी है अपना लोगे । और उसी रात उसकी मौत , रिपोर्ट भी अपने गायब करवा दी , जो कि हमने डाक्टर से निकलवा ली है , जिसमें साफ ज़ाहिर है कि राधा प्रेगनेंट थी और उसका गला घोंट कर मारा गया , सारे सबूत राजेश जी के ख़िलाफ़ थे , अब उनकी पैसा खाई पुलिस भी कुछ नहीं कर सकती उन्हें राजेश जी को अरेस्ट करना ही था ।


मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर )

ठिठुरते पाले में थोड़ा चैन तो दिलाओ-प्रेम बजाज




शीतल बयार बहती है, ठिठुरन बढ़ती जाती है,
सुरज छिप कर बैठ गया, पूस के ठंडे दिनों में,
पानी भी बर्फ सा जमता जाता है, बादल जैसे
घूम रहा धरती पर, कोहरा ऐसा छाया है, बदन
कांपता सर्द हवाओं से, हाथ-पांव भी लगे हैं
ठिठुरने पाले से, करते विनती सूर्य देव से, आ कर
दर्श दिखाओ ना, अपनी तेज किरणों से हमको थोड़ा
तपाओ ना, इस ठिठुरते पाले में थोड़ा चैन तो दिलाओ ना।
छोड़ रजाई तनिक हम भी देखे बाहर की ओर, लेकर हाथ
में गर्मागर्म चाय का प्याला,थोड़ी सेंकने धूप , रहम करो
ज़रा तुम उन पर पड़े जो किनारे सड़क के,ना कोई गद्दा,
ना रजाई पास उनके, ठंड में ठिठुरती हडि्डया उनकी,
पाले से किटकिटा रहे दांत हैं, डालो तपती किरणें उन पर,
ठंड से जो हो बेहाल रहे ।


मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर )

हम लिखते वो अफसाना लोग-प्रेम बजाज



कहते सुना है लोगों को हम लिखते हैं,
रो दे पड़ने वाला वो अफसाना लिखते हैं।

बर्बाद होना पड़ता है प्यार में हमेशा,
वरना आसानी से रिश्ते कहां निभते हैं।

प्यार में यार के इस क़दर डूबे हैं हम,
खड़े उसके लिए सरे बाज़ार बिकते हैं।

रोते हैं चुपके-चुपके याद में उसकी हम,
मगर सारे जहां को हंसते हुए दिखते हैं।

कहने को तो सोते हैं मखमल के गद्दे पर,
जुदाई में यार की अंगारों पर सिकते हैं।

ढुंढते फिर रहे हैं उन्हें कुल जहां में हम,
इसलिए एक जगह कहां हम टिकते हैं।

पढ़ोगे "प्रेम" को तो रो दोगे तुम भी
वो दर्दे-दिल, ज़ख़्म-ए-जिगर लिखते हैं।


मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर )

Monday, December 21, 2020

21वीं सदी की बुलबुल-प्रेम बजाज




हैलो .......""शीतल बिटिया कहां हो, कब तक पहुंचोगी , कब से राह तक रहे हैं ?
""बस मां दस मिनट में पहुंच जाएंगे , अभी - अभी बस से उतरे हैं बस रिक्शा किया और सीधा आप लोगों के पास ।
दस - पंद्रह मिनट बाद शीतल अपने मायके पहुंची जाती है , मां - पापा ,भाई - भाभी , बच्चों से सबसे मिलती है  उसका बेटा सौरभ भी सबसे मिलता है ।  
""अरे बुलबुल दिखाई नहीं दी वो कहां है ,बाहर है क्या ??
""नहीं, बुलबुल घर पर ही है, उसे नहीं लाई।
""कितनी बार कहा है उसे यूं अकेला ना छोड़कर आया कर लेकिन तु है कि सुनती ही नहीं । 
""अरे मां  बुलबुल अकेली कहां है दादा - दादी  , चाचा , बुलबुल के पापा सभी तो हैं , और छोटी बुआ भी तो शहर में ही रहती है वो भी अक्सर आ जाया करती है ।  और वो गौरव जो मेरी बड़ी ( जीजी ) ननद का बेटा वो तो बहुत ख़्याल रखता है बुलबुल का ।   
""हे भगवान् ना जाने कब समझेगी ये लड़की, आज के वक्त में अपने जाए पर तो भरोसा नहीं और तु चली औरों पे भरोसा करने । 
""ओफ्फो मां , अब छोड़ो भी, कुछ नाश्ता - वाश्ता कराओ भूख लगी है ।
प्रेम ( शीतल की मां ) नाश्ता बना रही है और खो जाती अपने जीवन के उन दिनों में जो नासूर बन कर उसे हर पल कटोचते हैं ।  उसकी बुआ का लड़का ( गोविंद ) भी तो उन्हीं के घर में रहता था , बहुत भरोसा था सभी को उस पर तभी तो कहीं भी जाना हो  गोविंद के साथ उसे भेज देते थे , खुद कहीं जाना है तो घर पर गोविंद के  सहारे छोड़ कर निश्चिंत हो जाते थे , कहते थे गोविंद भाई है ना तेरे साथ , वो तेरा अच्छे से ध्यान रखेगा ‌ , लेकिन कोई नहीं जानता था कि कैसा ध्यान रखता था वो घर पे अकेले होते जब,   कभी उसके शरीर पर हाथ फिराता , कभी उसकी छाती को चुमता , कभी उसके गुप्तांग को हाथों से सहलाता और साथ में कहता   ""मां को मत बताना वरना मां तुम्हें ही  डांटेगी , उससे बात करते हुए गंदे- गंदे शब्दों का इस्तेमाल करता , फिर कहता ये शब्द कितने अच्छे हैं ना पर मां को मत बताना  , हर बात नहीं बताया करते , और वो चुप रह जाती ।
""मां आप भी आओ ना सब मिलकर नाश्ता करते हैं  ।
"" अं ..... हां हां आई ........आई ‌।
सभी नाश्ता करते हैं मिल बैठ कर लेकिन प्रेम का मन कहीं और भटक रहा है । जल्दी से सारा काम निपटा कर  शीतल और प्रेम दोनों मां - बेटी आ बैठती है कमरे में , सौरभ मामा - मामी  से बातें कर रहा है और शीतल मां से ।
""मां कहां खो जाती हो , क्या हो जाता है आपको बुलबुल की इतनी चिंता क्यों करती हो , वो अब छोटी बच्ची नहीं है ‌।
"" शीतल, बेटा तुम बहुत भोली है, इस तरह लड़की जात को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए,  मुझे पता है अब तुम कहेगी सब तो हैं उसके पास,  मैं जानती हूं सब हैं , लेकिन तु तो नहीं ना ।
"" मां आप बेकार में चिंता करती हो, बुलबुल भी आप ही की तरह स्ट्रांग है , तभी तो आपके बचपन का नाम बुलबुल मैंने उसका नाम रखा ।
"" तुझसे कितनी बार कहा मेरे बचपन की कोई बात ना किया करो ।
"" क्यों मां , आप हमेशा ऐसे कह के मुझे चुप करा देते हो, आज आप को बताना होगा कि आखिर क्या ऐसा दु:ख  है जो आपको अन्दर ही अन्दर साल रहा है ।
प्रेम शीतल को अपने बीते कल की सारी घटनाएं बताती है ।
"" तुमने अपनी बेटी का नाम बुलबुल इसलिए रखा कि मुझे बचपन में बुलबुल बुलाते थे सब , तु कहती हैं ना कि मां मैं भी अपनी बेटी को इस बुलबुल जैसा स्ट्रांग बनाऊंगी ।
तो सुन ये बुलबुल बचपन में इतनी स्ट्रांग नहीं थी जितनी अब हो गई है। ज़माने ने इसे पत्थर बना दिया है ।
मेरी बुआ का लड़का हमारे ही घर रहता था , और उसके बारे में सब कुछ बताया शीतल को कि वो प्रेम के साथ कैसे और क्या किया करता था , उसके बाद चाचा की शादी थी , उसने भी हाथ आजमाने के लिए उसे ही चुना उस पर अपने तरीके अपनाता कि वो अपनी बीवी के साथ  गृहस्थ कैसे रहेगा। तब भी उसे किसी से कुछ ना बताने को मजबूर किया गया।
छोटे मामा नानी के कहने से बाहर थे उन्हें समझाने के लिए हमारे यहां पिताजी के पास भेजा गया, मामा ने भी जब - जब अकेली देखा, कभी होंठों का रस पिया तो कभी जिस्म पे हाथ फेरा।
जो भी रिश्तेदार आता हर कोई किसी ना किसी बहाने प्यार से और कोई नज़रों से बदन को छू जाता ।
"" हे भगवान्  मां आप ने इतना सहा, विरोध क्यूं नहीं किया किसी का ?
"" बेटी , विरोध करना औरत के नसीब में इश्वर लिखना भूल गया था।
विरोध करती , आवाज़ उठाती भी तो किसके खिलाफ , सभी पीड़ा देने वाले  अपने सगे ही तो थे , किसकी शिकायत किससे करती ।
इसलिए मुझे इस बुलबुल नाम से ही भय लगता है, जो मेरे साथ बीता वो तेरे साथ ना हो, इसलिए मैं एक पल के लिए भी कभी तुझे अकेला नहीं छोडती थी , कहीं भी जाती थी , तुझे हमेशा साथ लेकर जाती, कि कहीं ऐसा ना हो , फिर से वही पीड़ा सामने आए । इसलिए तुझे हर बार यही कहती हूं बुलबुल को अकेला मत छोड।
"" नहीं मां मैं बुलबुल के साथ ऐसा नहीं होने दूंगी। मैंने बुलबुल को सब समझाया हुआ है , हमारी बुलबुल गुड टच, बैड टच , अच्छा क्या , बुरा क्या , किस की हरकत किस हद तक बर्दाश्त करनी है, किसे पलट कर कैसे और कब, कहां वार करना है , ये सब जानती है , और आजकल तो स्कूलो में भी बच्चों को ऐसे विषयों पर जानकारी दी जाती है।
मां ये आज की बुलबुल है , 21 स्वीं सदी की बुलबुल, जो ना जुल्म सहेगी और ना किसी को  सहने देगी ।
इंट का जवाब पत्थर से देगी , वहशी दरिंदों को सबक सिखाएगी।
         ये 21सवी सदी की बुलबुल है । 



मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर)

उत्सव एक अलग की कला-प्रेम बजाज




आज की कविताओं में विनोद का ज़माना है , लेखक परोसे, पाठक पढ़ें, श्रोता बनता विनोद का  सारा जमाना है । अब ना सच्चा विनोद है साहित्य में, ना सच्चा विरोध रहा, कहीं साहित्य बिक रहा, कहीं साहित्यकार बिक रहा।
छींटाकशी और विनोद की कविताओं में ना कोई सीमा - रेखा है  ।   जहां मिले माया वहां साहित्यकार खूब विनोद, छींटाकशी उड़ेलता है,  कहीं साहित्यकार से ही खुद अपना साहित्य बेचने को मजबूर किया जाता है। किए जाते हैं साहित्यिक उत्सव , कलमकारों का उत्साह वर्धन होता है, 
जैसे त्योहारों के उत्सव में बच्चों का लगता तांता है ।
अमीर मनाए उत्सव  तो विनोद का समां बंध जाता है , रहती ना कोई सीमा- रेखा विनोद की  सब दुःख दूर भाग जाता है ।
ग़रीब मनाए कैसे उत्सव कोई उसकी तो तनख्वाह भी तो बेमानी है , कहीं फीस बच्चों की है भरनी, कहीं अन्य भत्तों का भी पलड़ा भारी है ।
दूध, किराया, राशन और बचा खुचा मरहम पट्टी और दवा का बिल उससे भरा जाता है ।
आज के समय में मनाना हो उत्सव  तो सीखो आज के तेवर तुम , तनख्वाह के साथ- साथ ऊपर का पैसा कमाना पड़ता है ।


मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर )

Sunday, December 20, 2020

हम जो उतरे सागर में साहिल पे-प्रेम बजाज



हम जो उतरे सागर में साहिल पे खड़े लोग देखा किए ,
मौजों ने लगाया पार हमें साहिल ने फिर मझदार में ला खड़ा किया ।
ना -खुदा के ज़ुल्मों - सितम का करूं क्या मैं बयां ,
सितम तो मुझ पर अपनों ने ही किये ।
माना कि हम दो किनारे हैं दरिया के मिलना मुमकिन नहीं
चलते हैं साथ ये भी तो कम नहीं ।

रहते हो ख़्वाबगाह में भी किनारे की तरह ,
एक किनारा खामोश और एक सिसका किए ।
फ़ना हो कर इश्क में तुम्हारे तड़फते रहते हैं रात भर
यूं ही तेरी आंखों के समुन्दर में डूब जाने के लिए ।
सारा जहां बेशक कर ले किनारा तुझसे मेरा साथ ना छुटेगा
दो किनारों सा है प्यार हमारा संग रहा , संग रहेगा ।

लहर नहीं मैं कश्ती हूं प्यार के समुन्दर की, लहर तो आकर लौट जाती है ,
कश्ती किनारे का साथ सदा रहता है ।
नहीं होश कोई हम दोनों को ,इस प्यार की उफ़नती नदी का
पानी मदहोश किए जाता है छु कर तुझे , मुझे आ छुता है ।
हम दो किनारे मिलकर बिछड़ने के लिए , बिछड़ कर मिलने के लिए ,
ये लहरें कुछ तुमसे ले आती हैं , कुछ मुझको दे जाती हैं ,
यही तो हमारा प्रेम है , दो किनारों का अमर प्रेम ।


मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर )

Monday, December 14, 2020

संघर्षों के साथ जीवन यापन की कला-अनुराग ठाकुर

संघर्षों के साथ जीवन यापन की कला


जीवन संघर्ष का दूसरा नाम है ,हाँ जी संघर्ष ही जीवन है ।संघर्ष! यह एक ऐसा अनुभव है जिससे शायद ही दुनिया का कोई व्यक्ति वंचित रहा होगा। हम सब को बचपन से ही सिखाया जाता हैं कुछ भी पाने के लिए संघर्ष करना ही पड़ता है। बिना संघर्ष कभी कुछ हासिल नहीं कर सकते समाज में प्रतिष्ठा, नाम-शोहरत, रुपया-पैसा, तरक्की या फिर पढ़ाई में अव्वल होना हो, चाहे जो भी लक्ष्य हो उसे प्राप्त करना बिना संघर्ष के संभव नहीं।
इसमें कोई दोराह नहीं की संघर्ष जीवन को तराशता है, निखारता है, सँवारता है और फिर हमें ऐसे साँचे में गढ़ता है जिसकी प्रसंशा दुनिया करते हुए नहीं थकती। शायद यही वो मुकाम या मंजिल होती है जिसके लिए मनुष्य भरशक प्रयास करने से पीछे नही हटता है जिसे हम संघर्ष कहते हैं। इसके पश्चात जो सफलता प्राप्त होती है निसंदेह वो अतुलनीय होती हैं। संघर्ष ही है सफलता की कुंजी है । संघर्ष जीवन के उतार-चढ़ाव का अनुभव कराता है, अच्छे-बुरे का ज्ञान करवाता हैं, सतत सक्रिय रहना सिखाता है, समय की कीमत सिखाता है जिससे प्रेरित होकर हम सशक्तिकरण के साथ फिर से अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित होते है और जीवन जीने के सही तरीके को सीखते हैं। दुनिया का हर व्यक्ति जीवन में सफलता की उम्मीद करता हैं जिसके लिए वो अथक प्रयास भी करता है। कई बार कुछ अलग करने की चाह और प्रबल प्रेरणा से व्यक्ति अपने मुकाम के करीब पहुँच भी जाता है लेकिन कुछ कठिन संघर्ष को सामने देख सफलता से वंचित हो जाता है।
और वह नहीं जान पाते की उनके साथ ऐसा क्यों हुआ ,जिस कारण उनके सपने अधूरे के अधूरे रह जाते है और जीवन के अंतिम पलों तक उनकी इच्छाएँ आधी-अधूरी रह जाती है। ऐसी इच्छाएँ उन्हें अपने जीवन से निराश के मोड़ पर लाकर के खड़ी कर देती है क्योंकि अधिकांश लोग अपने संपूर्ण जीवन में यह जान ही नहीं पाते की सफलता कैसे हासिल करें । जीवन ‘संघर्ष’ का दूसरा नाम हैं। एक बात हमेशा याद रखिए, अपनी मंजिल का आधा रास्ता तय करने के बाद पीछे ना देखे बल्कि पूरे जुनून और विश्वास के साथ बाकी की आधी दूरी तय करे, बीच रास्ते से लौटने का कोई फायदा नहीं क्योंकि लौटने पर आपको उतनी ही दूरी तय करनी पड़ेगी जितनी दूरी तय करने पर आप लक्ष्य तक पहुँच सकते है। आगे बढ़कर भी अगर सफलता ना मिल पाई तो भी कोई बात नहीं कम से कम अनुभव तो नया होगा। बार-बार हार के भी हिम्मत के साथ अपने टारगेट की तरफ कदम बढ़ाना ही संघर्ष है। अपनी हर असफलता से कुछ सीखिए और निडरता के साथ संघर्ष का दामन थाम के मंजिल की ओर आगे बढ़िए।
जब तक जीवन में संघर्ष नहीं होता तब तक जीवन जीने के अंदाज को, सच्ची खुशी को, आनंद को, सफलता को अनुभव भी नहीं कर सकते। जिस तरह बिना चोट के पत्थर भी भगवान नहीं होता। ठीक उसी तरह मनुष्य का जीवन भी संघर्ष की तपिश के बिना ना तो निखर सकता है, ना शिखर तक पहुँच सकता है और ना ही मनोवांछित सफलता प्राप्त कर सकता है। क्योंकि ”संघर्ष हमारे जीवन का सबसे बड़ा वरदान है और वो हमें सहनशील, संवेदनशील और देवतुल्य बनाता हैं।” जीवन में संघर्ष करते वक्त एक बात का सदैव ध्यान रखें कि लोग आपकी प्रशंसा कर रहे या बुराई क्योंकि ये दुनिया की रीति है यदि आप अपने मन से कुछ अच्छा करने की विचारधारा को लेकर प्रयास करने को लेकर कदम को बढ़ाया यदि आपको उसमें सफलता मिल गई तो आपकी प्रशंसा के अंबार लग जायेंगे वहीं यदि आप किसी कारण वश अपने मुकाम तक नही पहुँच सके तो आपको बुराइयों के साथ साथ ताने सुनने से कोई नही रोक सकता है तो आपको इतना याद रखना है कि आपको उनकी नकारात्मक सोच को पीछे छोड़ अपने तक पहुँचने में फिर से अथक प्रयासों में लग जाना है संघर्ष के इस सूत्र को समझिए और उसपर चलने की कोशिश कीजिए। यकीन मानिए आप जीवन को एक अलग रूप से देखने लगेंगे।

अनुराग ठाकुर (पत्रकार)
                           औरैया-उत्तर प्रदेश

Saturday, December 5, 2020

छोड़ दो अब तो बहुत हुआ-प्रेम बजाज


 


मत जकड़ो मुझे इस तरह ,छोड़ दो अब तो बहुत हुआ 
ना सताओ मुझे बक्श दो अब तुम्हारा ज़ुल्म बहुत हुआ ।

मैं  वो इन्सान हूं जिसने नहीं सताया  कभी किसी  बेजुबान को ,
नहीं कभी प्रकृति को कोई कष्ट पहुंचाया मैंने, तो क्यों  दी 
जा रही मुझे सज़ा ।

मैंने तो कोई बिमारी नहीं फैलाई , किसी मासूम का कत्ल 
नहीं किया , नहीं किसी अबला पर ज़ुल्म किया ,ना ही किसी की 
आबरू  का कत्ल किया, नहीं किसी के मुंह से छीना निवाला ।

फिर मुझे  क्यों दी जा रही है सज़ा , क्यों मुझ पे ये  आपदा आई 
क्यों मुझ पर डा रहे हो कहर, क्यों बना कठपुतली नचा रहे हो मुझे 
बस करो छोड़ दो अब तुम्हें खुदा का वास्ता , अब बहुत हुआ ।

हे ईश्वर अब तो मुझ पर करो रहम , मुझे निकालो इस मकड़ी जाल
से , बस अब बहुत हुआ ।


मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर)

Thursday, December 3, 2020

एक लड़की पहेली सी -प्रेम बजाज




मै जब भी आफिस जाता , अक्सर बस स्टैंड पर एक लड़की मुझे नज़र आती , जैसे ही बस आकर रूकती, हम सब में बस पे पहले चढ़ने की होड़ सी लग जाती , लेकिन वो इत्मीनान से खड़ी रह कर पहले औरों के चढ़ने देती और फिर खुद चढ़ती, और अगर बस मे जगह ना हो तो वो नीचे ही खड़ी रह जाती , अगर चढ़ जाती तो कोई बुज़ुर्ग या बच्चा होता तो बैठने के लिए पहले उसे सीट देती ।

अक्सर मैं देखता बस मे अगर किसी का बच्चा परेशान करता या रोता तो ना जाने क्या जादू था कि वो उसे गोद में लेकर झट से चुप भी करा देती और बैग से निकाल कर उसे चाकलेट भी देती ।मै बस उसे देखता ही रहता , कई बार मन चाहा कि उससे बात करू, मै दिल ही दिल मे उसे चाहने लगा था । लेकिन अचानक कुछ दिनों से वो नज़र नहीं आई, आँखे रोज़ उसे उसी बस स्टैंड पर ढुँढती ,पर पुछु तो किससे , कोई भी कुछ भी नहीं जानता था उसके बारे में ।

एक दिन मैं दोस्तो के साथ किसी होटल मे खाना खाने गया तो अचानक मेरी नज़र सामने के टेबल पर पड़ी वही लड़की लाल सुर्ख जोड़े में गहनों से लदी थी , और उसके साथ एक अधेड़ उम्र का शक्स , दिखने मे कुछ अजीब सा भी था ,हाव-भाव से लग रहा था कि पति-पत्नि हैं , लेकिन लड़की के हाव-भाव से पता चल रहा था कि वो खुश नहीं है । मैने सोचा एक बार मिला जाए लेकिन इतने मे वो उठ कर चले गए और वो लड़की मेरे दिल पर एक छाप छोड़ गई, जो हर समय हँसती रहती थी , वो आज खोई-खोई सी लग रही थी , ना जाने क्या थी उसकी कहानी, एक पहेली सी बन कर रह गई वो लड़की मेरे लिए ।



मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर )

गर्ल चाइल्ड डे-प्रेम बजाज

सुनो-सुनो ए भारत की नारी , नहींं रही अब तु बेचारी क्यों जन्म से पहले ही कोख में बेटी को मार जाता है । तुम भी तो एक बेटी हो तभी गर्भ धारण ...