Saturday, October 31, 2020

जनसत्ता दल लोकतांत्रिक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बाहूबली राजा भैया का जन्मदिन



बिधूना-औरैया -आज जनसत्ता दल लोकतांत्रिक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष कुंवर रघुराज प्रताप सिंह राजा भैया का जन्मदिवस बड़ी धूमधाम से मनाया गया ,इस अवसर पर कथा हवन पूजन व कन्या भोज के साथ उनकी लम्बी उम्र की कामना की गयी जबकि जनसत्ता दल के पदाधिकारियों द्वारा केक काटकर मिष्ठान वितरण किया गया| कार्यक्रम का आयोजन जिला प्रधान महासचिव डॉ माधवेन्द्र प्रताप सिंह द्वारा किया गया| कार्यक्रम में मुख्य रूप से जिला अध्यक्ष औरैया नितेंद्र सिंह सेंगर (गौरव ),जिला प्रधान महासचिव औरैया माधवेंद्र प्रताप सिंह, राजवीर सिंह जिला महासचिव, कुलदीप पुंडीर युवा प्रधान महासचिव औरैया विमल सेंगर जिला जिला अध्यक्ष छात्रसत्ता, परमेंद भदोरिया जिला उपाध्यक्ष विशाल सेंगर युवा जिला महासचिव अभिषेक राठौर जिला उपाध्यक्ष युवा छोटे संखवार अभिषेक राठौर,शिवम् मिश्रा विधानसभा अध्यक्ष युवा पवन राजपूत, अभिनेंद्र राजपूत ,अरविंद पुंडीर पुरवा पट्टी , दीपेंद्र सिंह आदि उपस्थित थे|

मौन के भी शब्द होते कभी सुनो तो सही-प्रेम बजाज



मौन के भी शब्द होते हैं कभी सुनो तो सही ,
मेरी आंखें माना मौन है , मगर सपने तो वो भी बुनती है ,
तुम कहते हो मैं नहीं चलुंगा तुम्हारे संग इन वादियों में ,
मैं मौन होकर चल देती हूं अकेली ,
तुम कहते हो मैं चलूं तुम्हारे संग हर पथरीली राह पर ,
मैं मौन हो चल देती हूं संग तुम्हारे ,
मौन का अर्थ ये नहीं कि वो पथरीली राहें मुझे चुभती नहीं ,
करते हो तिरस्कार मेरा सरे महफ़िल ,
मैं रह जाती हूं मौन तो क्या मुझे तकलीफ़ नहीं ,
छु लेती हूं तुम्हें तो कर लेते हो किनारा ,
कभी बुझा कर अपनी पिपासा मोड़ लेते हो मुंह ,
कभी तो बन बदरा प्रेम सुधा रस बरसाओ ना ,
प्यासी धरा सी रह जाती हूं मौन तो क्या मेरे अहसास नहीं ?
जिस दिन दे दिए शब्द मैनें अपने मौन को आ जाएगा एक ज़लज़ला ,
बह जाएगा जिसमें सबकुछ , सुनोगे जिस दिन मेरे मौन की गुंज ,
बहरे हो जाओगे मेरे मौन के शब्दों से , इसलिए मुझे मौन रहने
पर इतना मजबूर ना करो , मेरे मौन के शब्द सुनो ।


मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर )

करवाचौथ स्पेशल सजना है मुझे सजना के लिए -प्रेम बजाज





.......सजना है मुझे सजना के लिए .............
...................जी हाँ दोस्तो आजकल तो सब के होंठ यही गुनगुना रहे होंगे,
और सब खूब शोपिंग मे बिज़ी होंगे बडी़ लम्बी चौडी़ लिस्ट बना कर ।
.सब की लिस्ट लगभग एक सी ही होती है । सब सखियाँ अपने पिया से यही माँग करती है ।
माथे अपने का तिलक लगा कर चाँद सी इक बिँदिया सजा दो,
सिँदूर के लाल रँग से मेरी पिया तुम माँग भरा दो ।
हीरा, मोती, सोना, चाँदी, कुछ नही चाहिए मुझको साथी ।
काँच की मुझ को चुडी़ ला दो, लज्जा के गहने बना कर, बाँहो की इक कँठी पहना दो ।
नैनो का काजल बने तेरे सपने, होठों की लाली मुस्कराहट को बना दो ।
अरमानो की साडी़ ला दो, स्वाभिमान की चुनर औढा़ दो , प्यार का उसपे गोटा लगा दो ।
प्रेम-बँधन की पायल मै बाँधु, इँद्रधनुष के बिछुए पहना दो ।
इज़्ज़त की इक कार ला दो, उसमे बैठा के सैर करा दो ।
खुशियो के तुम तोहफे ला दो, गिनती उनकी करना ना तुम, बस उनके तुम ढेर लगा दो ।
सात फेरो का वचन निभा दो, अर्धाँगिनी का तुम दर्जा दे दो ।
साथ चलने का हक भी दे दो, कभी ना छोड़ कर जाने का इक वादा दे दो ।
स्वाभिमान से जीना दे दो, अपने घर की इज्ज़त बना दो ।
देखे ना कोई बुरी नज़र से, अपनी नज़र की ढाल बना दो ।
ऐसा मोहे सज दे साँवरिया, लग जाए मोहे तोरी नज़रिया ।
साए के जैसे संग रहुंगी , बन कर दीप तेरी राह में जलुंगी , दुःख- सुख
में सदा मैं संग रहुंगी , प्यार की ठंडी छांव करूंगी ।
लांघ कर आई तेरी चौखट , इस चौखट पर ही प्राण तजुंगी ।


मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर)

Friday, October 30, 2020

सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो-भावना ठाकर



जीवन का सफ़र पथरीला कंटीला और तप्त है हमसफ़र गर समझदार मिले तो आसानी से कटता है वरना मंज़िल तक पहुँचने से पहले रास्ते उलझ जाते है।
सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो,
बने बनाये हैं साँचे जो ढल सको तो चलो।सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो-भावना ठाकरसफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो-भावना ठाकर
किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं,
तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो।
सिर्फ़ बस, ट्रेन या प्लेन में कहीं जाने का नाम ही सफ़र नहीं होता। ज़िंदगी जीना भी एक सफ़र ही तो है। निदा फ़ाज़ली जी की ये रचना ज़िंदगी के सफ़र को परिभाषित कर रही है। धूप छाँव की बयार से उलझते संघर्षों के बिहड़ जंगलों से गुज़रते सबको जीना है।
किसीको बिना संघर्ष किए बैठे बिठाए गद्दी मिल जाती है तो कोई संघर्षो से जूझते हुए शून्य से शुरू करता है। किसीके पास भरे-पूरे परिवार का वितान होता है जिसकी छाँव तले सुकून सभर ज़िंदगी कट जाती है। पर कोई कमनसीब ऐसा भी होता है जिसे ना बरगद की घनी छाँव नसीब होती है नाहि अमलतास की हरियाली बस अनमना सफ़र कट रहा होता है। रिश्तों के सफ़र में भी कहाँ हर रिश्ते को मंज़िल मिलती है। हल्की सी अनबन पर कब सर से आसमान उठ जाएं पता ही नहीं चलता।
पर दांपत्य के सफ़र में जब दो अनदेखे अन्जाने हाथों में हाथ लेकर चल पड़ते है जीवन रथ की डोर थामें तब दोनों तरफ़ से सिरे की तुरपाई पर मजबूती से चाहत के टांके लगाते कड़ी धूप को सहकर भी सफ़र को अंजाम देने की भरपूर कोशिश करते है। धूप से घबरा कर छाँव की चाह में आधा सफ़र नहीं छोड़ते। और जो ज़िंदगी की धूप सह लेते हो वो अपने हिस्से की छाँव बखूबी पा भी लेते है। या तो खुद छाँव उस मुसाफ़िर को ढूँढ लेती है। धूप की तप्त परछाई से बिना डरे जो चलते रहते है उसके साथ उसके नसीब का आदित भी झिलमिलाते सफ़र करता रहता है।
आसान नहीं दांपत्य का सफ़र। खुद के वजूद का चोला उतार कर दूसरे के सांचे में ढ़लना पड़ता है। अपनी पसंद नापसंद को भूलाकर जीवनसाथी को खुश करना पड़ता है। शादी सिर्फ़ रस्म नहीं दो लोगों के जीवन रथ की नींव है जिसे एक सुहाना सफ़र समझकर तय करना जरूरी है। सात फेरों का छोटा सफ़र तय करते और हस्त मिलाप के विधि विधान के साथ वचन लेते चार आँखों की मंज़िल फिर एक होनी चाहिए। यकीन के स्निग्ध तार से बंधे पति पत्नी को हर सुख दु:ख में धूप छाँव सहते एक दूसरे को संभालते चलना है तभी दो दिल लग्नवेदी की अग्नि से शुरू किया हुआ सफ़र चिता की आख़री आँच तक आनंद लेते हुए ख़त्म करते है। वरना तो बस कट रहा होता है।
तभी तो निदा फ़ाज़ली जी की रचना का नायक नायिका को आगाह करते पूछता है सफ़र में धूप तो होगी चल सको तो चलो।
(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)#भावु

थोड़ा थक सी गई हूँ मैं.....



थोड़ा थक सा गया
थोडा थक गया हूँ , , ,
दूर निकलना छोड दिया है।
*. . . पर ऐसा नहीं है की , , ,*
*मैंने चलना छोड दिया है ।।*

फासले अक्सर रिश्तों में , , ,
. . . दूरी बढ़ा देते हैं।
*. . . पर ऐसा नही है की , , ,*
*मैंने अपनों से मिलना छोड दिया है ।।*

हाँ . . . ज़रा अकेला हूँ , , , दुनिया की भीड में।
*. . . पर ऐसा नही की , , ,*
*मैंने अपनापन छोड दिया है ।।*

याद करता हूँ अपनों की , , ,
. . . परवाह भी है मन में।
*बस , कितना करता हूँ , , ,*
*ये बताना छोड दिया।।*


                                   अनुराग सिंह सेंगर
                                   (औरैया)

रीति रिवाजों से भरा पड़ा जीवन-प्रेम बजाज




आकाश खत्री उम्र 30 साल एक छोटा सा बेटा 4 साल का , अचानक आकाश को हार्ट अटैक आया और वो चल बसा ।
अब अन्तिम क्रिया क्रम तो सब बेटा ही करता है , और आकाश का बेटा चन्दन बहुत छोटा और प्रीमैच्योर होने की वजह से बहुत कमज़ोर, और उस पर दिसंबर की ठिठुरती ठंड ।
लेकिन रिश्तेदार सब यही कह रहे कि मुखाग्नि के बाद चन्दन नहा धोकर नीचे वहीं फर्श पर सोएगा , जहां आकाश को मुखाग्नि से पहले रखा गया था , और चौथे वाले दिन‌ भी सुबह चार बजे उठकर श्मशान घाट पर भी जाना है ज़रूर ।
चन्दन की मां ने बहुत कहा कि मासूम बच्चा ये कैसे कर पाएगा , जबकि आकाश तो उसे नंगे पांव भी ज़मीं पर नहीं चलने देते थे , कहीं ठंड ना लगा जाए ।लेकिन सभी रिश्तेदार रीति रिवाज का रोना रोते रहे ।आखिर चन्दन को ये सब करना पड़ा । और वो इस ठिठुरती ठंड से इतना बीमार हुआ कि रीति-रिवाजों की बलि चढ़ गया , और एक औरत ने रीति-रिवाजों की आढ़ में अपना सब कुछ खो दिया ।

मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज , जगाधरी ( यमुनानगर )

मीडिया को जिम्मेदार बनाने की पहल कौन करेगा -वीरेन्द्र बहादुर सिंह



लाख रुपए का सवाल यह है कि मीडिया को जिम्मेदार बनाने की जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी? संसद, सरकार या अदालतें आगे आएंगी या सामान्य आदमी इसका नेतृत्व कारेगा या फिर बाजार की ताकतें इन्हें जिम्मेदार बनाएंगी? फिलहाल तो सरकार ने इस सारे मामले से हाथ खींच लिए हैं। पैसा देकर टीआरपी बढ़ाने का न्यूज चैनलों का घोटाले का खुलासा हुआ तो सूचना और प्रसारणमंत्री ने कहा कि व्यवस्था में बहुत बड़े बदलाव की जरूरत है, पर यह बदलाव करना सरकार के कार्यक्षेत्र में नहीं है।
तो क्या इसके लिए न्यायालय से अपेक्षा की जा सकती है? फिलहाल देश की अनेक अदालतों में मीडिया अथवा उससे जुड़े लोगों को लेकर केस दाखिल किए गए हैं। कोरोना फैलने के एकदम शुरू के दिनों में दिल्ली में तबलीगी जमात के तमाम लोगों के बड़ी संख्या में कोरोनाग्रस्त मिलने की घटना का जिस तरह से कवरेज किया गया था, उसे लेकर हाईकोर्ट कुछ दिनों पहले ही नाराजगी जता चुका है। कोर्ट ने कहा था कि इस मामले में अभव्यक्ति की आजादी का दुरुपयोग किया गया था। मीडिया द्वारा अभिव्यक्ति की आजादी के दुरुपयोग को लेकर बॉलीवुड भी सामूहिक रूप से कोर्ट में पहुंचा है और उनके बारे में मन में जो आए वह बोलने पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है।
इसके पहले बाजार ने भारतीय मीडिया को जिम्मेदार बनाने की एक पहल की है और उसका स्वागत भी होना चाहिए। जबकि उसके अपने भी भय हैं, परंतु अगर मीडिया की इज्जत और स्वतंत्रता बचानी है तो इस तरह की पहल का स्वागत करना ही पड़ेगा। पारले-जी कंपनी ने कहा कि आक्रामक और हमेशा जहर उगलने वाले समाचार परोसने वाले न्यूज चैनलों को वह अपने एक भी प्रोडक्ट का विज्ञापन नहीं देगी। उसके पहले ऑटोमोबाइल सेक्टर की कंपनी बजाज ग्रुप ने घोषणा की थी कि वह भड़काऊ और समाज को विभाजित करने वाली सामग्री प्रसारित करने वाले चैनलों को विज्ञापन नहीं देगी। दोनों कंपनियों की पहल अच्छी है और उनके इरादे के बारे में शंका भी नहीं करनी चाहिए।
पर इसमें डर इस बात का है कि देश में हर जगह सरकारी विचारधारा के आधार पर विभाजन हो रहा है और इसे ध्यान मेें रख कर देखा जाए तो संभव है कि आगे चल कर भी कोई कंपनी ऐसा कह सकती है कि सरकार विरोधी कंटेंट दिखाने वाले को विज्ञापन नहीं देगी अथवा किसी पार्टी या किसी नेता का विरोध करने वाले चैनल या अखबार को विज्ञापन नहीं देगी। अगर ऐसा होता है तो इससे मीडिया को जिम्मेदार बनाने के बजाय माहौल और अधिक बिगड़ने का खतरा पैदा हो सकता है।
इसलिए सबसे अच्छी बात यह होगी कि मीडिया अपना नियमन खुद ही करे। पर सवाल यह है कि मीडिया अपना नियमन स्वयं किस तरह करे? एक रास्ता यह है कि पत्रकारत्व के उच्च आदर्शों को नजर के सामने रखा जाए और उसके आधार पर आचरण हो। पर वर्तमान समय में यह संभव नहीं है। अखबारों को सर्क्यंलेशन बढ़ा कर नंबर वन होना है, तो चैनलों को टीआरपी में नंबर वन होना है। इसी तरफ डिजिटल मीडिया को भी व्यूज की संख्या बढ़ा कर अग्रसर होना है। इसमें आजकल नंबर वन बनाने वाले कितने ‘चोर दरवाजे’ भी खुल गए हैं। डिजिटल मीडिया के नकली या खरीदे गए व्यूअर्स देने का काम भी बेधड़क चल रहा है। सोशल मीडिया प्लेटकार्म भी रुपए लेकर सामग्री प्रमोट कर रहा है।
  1. ऐसा ही कुछ खेल प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में भी चल रहा है। यह उजागर करने वाले समाचार भी आ रहे हैं। यह भी पता चला है कि तमाम संस्थाएं सर्क्युलेशन और टीआरपी के आंकड़ों में अग्रसर रहने के लिए तरह-तरह के उल्टे-सीधे रास्ते अपना रहे हैं। विज्ञापन पाने के लिए ऐसा करना जरूरी होता है। हकीकत में विज्ञापन की पूरी व्यवस्था आंकड़ों के गणित पर ही टिकी है। आंकड़े बढ़ाने की होड़ के कारण ही समाचार की गुणवत्ता प्रभावित होती है। इसी होड़ में अखबार, चैनल और डिजिटल मीडिया लोगों की रुचि पर असर डाल रहे हैं। हर वस्तु के आधार को उचित ठहरा दिया जाता है कि लोग यही देखना चाहते हैं। जबकि हकीकत उसकी उल्टी होती है। लोग मजबूरी में कमजोर कंटेंट देखते और पढते हैं।
देश के किसी भी नागरिक ने नहीं कहा कि न्यूज चैनलोें ने सालों पहले यह जो सिद्धांत स्थापित कर दिया था कि ‘थ्री सी’ यानी सिनेमा, क्रिकेट और क्राइम बिकता है। सालों तक ये तीनों चीजें बिकती रहीं। उसके बाद हर मामले को सनसनीखेज बना कर बेचना शुरू हुआ, जो आज भी चल रहा है। सबसे आगे रहने की होड़ में, सबसे पहले समाचार बताने की उतावल में और समाचार को सबसे अधिक सनसनीखेज बना कर पेश करने की चिंता में चैनल, डिजिटल मीडिया और कुछ हद तक अखबारों ने भी अपनी साख को नुकसान पहुंचाया है। नंबर वन बनने और अधिक से अधिक विज्ञापन पाने की प्रतियोगिता में लोकतंत्र का इस चौथे स्तंभ ने खुद को तमाशा बना लिया है, जिसे सुधारने की जरूरत है। संसद, सरकार और अदालतें यह काम कर भी रही हैं। बाजार ने तो शुरू भी कर दिया है। परंतु अच्छा यह होता कि अगर मीडिया स्वयं यह काम करती। अगर बाहर की ताकतें भले ही कोई उचित संस्था क्यों न हो, मीडिया को नियंत्रित करने या जिम्मेदार बनाने की पहल करेगी तो मीडिया को अपनी स्वतंत्रता और अधिकार खोने पड़ सकते हैं। इससे मीडिया समूहों को खुद ही पहल करनी चाहिए। प्रेस एसोसिएशन, ब्राडकास्ट एसोसिएशन, प्रेस काउंसिल आफ इंडिया, प्रेस क्लब जैसे संगठनों को आगे आना चाहिए। ऐसी कार्रवाई होनी चाहिए, जिससे सरकार, संसद और अदालतों को यह संदेश जाए कि मीडिया द्वारा घोटालों को सुधारने का प्रयास हो रहा है। यह अपने लिए अपनी गौरवशाली  विरासत को बचाने का एक निर्णायक पहल का समय है। क्योंकि स्वतंत्र और सद्बुद्धि वाला पत्रकारत्व बचेगा तभी देश, समाज, लोकतंत्र और नागरिकों को बचाना संभव होगा

बचपन की पुरानी यादें यादगार बनकर...

बहुत याद आती है पुराने मकानों की छतों पर गुजरी वो पुरानी यादें

पहले झाड़ू से छत को साफ़ करने की मुहिम, फिर पानी की बाल्टी से छिड़काव और अंत में उस पानी के सूखने पर उठने वाली भीनी-भीनी खुशबू,


दरियाँ बिझा कर लाइन से बिस्तर बिछाने की क़वायद, पानी की सुराही के मुंह को लोटे से ढंक कर रखने के जतन,

लेट कर दिखाई देने वाले वो चमकीले तारे,
रात भर बजता वो नीम का पेड़,

कभी आधी रात को मौसम ख़राब होने पर वो अपने -अपने बिस्तर समेट कर नीचे भागने की जल्दी...
.
कितना कुछ निगल गई है इन ए .सी. कमरों की घुटन।
...
काश,
वो वक्त फिर से आ जाए, जहाँ कम जगह में ज्यादा लोग रह लेते थे,
एक ही सब्जी के साथ छक कर खाना खा लेते थे,

सब आपस में बोलते-बतियाते थे,
मस्ती और शैतानियां तो खूब थी मगर छल-प्रपंच कोई नहीं जानता था। ठहाकों की गूंज पूरे in मोहल्ले में सुनाई देती थी।
...
सच,
कितना कुछ निगल गई है इन ए.सी. कमरों की घुटन..

अनुराग ठाकुर (औरैया)

बहुत याद आते है पुराने दिन और मकान




बहुत याद आते है पुराने दिन और मकान

बहुत याद आती है पुराने मकानों की छतों पर गुज़री वो बचपन की रातें,

पहले झाड़ू से छत को साफ़ करने की मुहिम, फिर पानी की बाल्टी से छिड़काव और अंत में उस पानी के सूखने पर उठने वाली भीनी-भीनी खुशबू,

दरियाँ बिझा कर लाइन से बिस्तर बिछाने की क़वायद, पानी की सुराही के मुंह को लोटे से ढंक कर रखने के जतन,

लेट कर दिखाई देने वाले वो चमकीले तारे,
रात भर बजता वो नीम का पेड़,

कभी आधी रात को मौसम ख़राब होने पर वो अपने -अपने बिस्तर समेट कर नीचे भागने की जल्दी...
.
कितना कुछ निगल गई है इन ए .सी. कमरों की घुटन।
...
काश,
वो वक्त फिर से आ जाए, जहाँ कम जगह में ज्यादा लोग रह लेते थे,
एक ही सब्जी के साथ छक कर खाना खा लेते थे,

सब आपस में बोलते-बतियाते थे,
मस्ती और शैतानियां तो खूब थी मगर छल-प्रपंच कोई नहीं जानता था। ठहाकों की गूंज पूरे in मोहल्ले में सुनाई देती थी।
...
सच,
कितना कुछ निगल गई है इन ए.सी. कमरों की घुटन..

पिता के पद चिंन्हो पर चलने का प्रयास

 प्रेरणा



पिता के पद चिंन्हो पर चलने का प्रयास


मेरे पिता स्व: शिशुपाल सिंह सेंगर ने मुझे जीवंन में समाज सेवा, परोपकारी व् ईमानदारी पर सदैव चलने के लिया नशीहत दी। पिता के गुजरने के बाद मुझे मेरी माँ ने बताया कि मेरे पिता एक सरल स्वाह के व्यक्ति थे । जो चाहते थे कि मुझे उच्च शिक्षा व् सदमार्ग पर चलने के लिए कहा,पिता जी की इच्छा थी कि मैं आगे चलकर अच्छी शिक्षा प्राप्त करूँ व् समाज में लोंगो की सेवा करूँ। जो लोग समाज की सेवा करते है उन्हें लोग हमेशा याद करते है और जो लोग अपने स्वार्थ के लिए जीवन यापन करते है उन्हें लोग भुला दिया करते है। मुझे हमेशा ऐसा प्रतीत होता है कि मेरे पिता का साया मेरे सिर पर रहता है। मैं हमेशा अपने पिता जी के बताएं रास्ते पर उनके पद चिंन्हो पर चलकर मन में सेवा भाव रखकर समाज की सेवा करूँगा।

गर्ल चाइल्ड डे-प्रेम बजाज

सुनो-सुनो ए भारत की नारी , नहींं रही अब तु बेचारी क्यों जन्म से पहले ही कोख में बेटी को मार जाता है । तुम भी तो एक बेटी हो तभी गर्भ धारण ...