सुबह के 4 बजे का समय है सुखिया अपने खेतो पर जा रहा है फ़सल को पानी देने और रास्ते में देखता है काशी राम जिनका खेत रास्ते में आता है, वो मेढ पर पानी रोकने के लिए अपने बेटे को बैठाया हुआ है, और बच्चा ठंड में पानी में बैठा कांप रहा है।
" काशी भाई राम- राम "
" अरे राम- राम सुखिया, खेत पर था रहे हो?"
" हां भई, इस समय तो खेत पे ही जाना है, अर्रेएएएएएए ये क्या, मेढ पर छोरे को क्यों बैठा रखा ? उसे बिमार करेगा क्या?"
" भई पानी नहीं रूक रहा था, कल भी मिट्टी चढ़ा के गया था, देख फिर उतर गई, अब होर तो कोई चारा ना है"
" अरे तो छोरे को मारेगा क्या? मासूम जान, और उपर से इतने कड़ाके की ठंडी, जो छोरे को कुछ हो गया तो क्या करेगा"?
" होर कोई चारा भी तो नहीं ना,
" भाई मेढ पक्की क्यों नहीं बनवा लेते ?"
" अरे सुखिया किस-किस चीज़ के लिए उधारी लूं, और फिर चुकाना भी तो है, कहां से चुकाऊंगा साहुकार का पहले ही इतना कर्जा है सिर पर" !
" हां भाई ये तो है , पिछली फसल का पूरा पैसा मिल जाये तो कुछ काम भी ठीक से हो जाए, कहां से लाएं, घर का खर्च करें या खेत का, आधा तो जमींदार खा जाता है, उसके बाद आढ़ती ले लेता है, सरकार तक फसल पहुंचते-पहुंचते आधी कीमत तो रास्ते में ही खत्म हो जाती है, बाकी जो आधी पल्ले पड़ती है, उसमें से तो खेत का खर्चा ही मुश्किल से निकलता है, और कभी राम जी की मर्जी ना हो तो फसल भी ढंग से नहीं होती, कभी तो राम जी बारिश ही नहीं करते सुखा पड़ने से फसल नहीं होती और कभी बिन बादल बरसात हो जाए तो खेतों में बाढ़ सी आ जाती है, तो भी फसल खत्म ।
" हां काशी भाई हम किसानों के तो कर्म ही खोटे है, हम अपनी धरती मां का सीना चीर कर नए-नए अंकुर निकालते हैं, जेठ की तपती दोपहरी में जब लोग कूलर, ए.सी. में सोए होते हैं, हम खेतों में काम करते हैं, पूस की ठिठुरती सर्दी में जब लोग बंद कमरों में कम्बलों में दुबके होते हैं, हम आधी- आधी रात को खेतों में पानी के बीच खड़े हो काम करते हैं, इतनी मेहनत-मश्शकत के बाद भी साहुकार के हमेशा कर्जदार ही रहते हैं , अगर सरकार एक मुल्य नियत कर दे तो कोई भी हमें धोखे में नहीं रख सकता और ना ही कोई बिचोलिया हमारी मेहनत की कमाई खा सकता है, पर कौन सुने हम किसानों की व्यथा!"
" लेकिन सुखिया ऐसे कब तक चलेगा, ना तो हम अपने बच्चों को बड़े स्कूल में पढ़ा सकते हैं, ना ही हम सुख- चैन की जिंदगी जी सकते हैं, सब को रोटी देने वाले को भी कभी-कभी भूखा सोना पड़ता है, कुछ ना कुछ तो इसका हल निकालना ही होगा ना, वरना तो आने वाली नस्लें तो खेती और किसानी के नाम से दूर रहेंगी, कोई भी किसानी करना नहीं चाहेगा"!
" काशी भाई कह तो आप सही रहे हो, इश्वर की कृपा से मेरे बुजुर्गो की बहुत जमीन जायदाद थी तो मैंने अपने छोटे भाई को अचछा पढ़ा दिया, नहीं तो इस कमाई में तो रोटी भी मुश्किल है, मैंने तो छोटे से कह दिया कि पढ़ाई खत्म करते ही, गांव में खेती करनी है, बस काशी भाई थोड़ा इंतजार और मेरे भाई ने अर्जी लगा दी है , जल्दी ही वो सरकार से बात करेगा और हमारा धान सीधा सरकार के पास पहुंचेगा और हमें सही दाम मिलेगा, और उसकी पढ़ाई भी मैंने कृषि की कराई है, जिससे वो हमें ऐसे नए-नए तरीके बताएगा खेती के जिससे फसल भी अच्छी हो"!
" हां सुखिया अब तो तेरे भाई का ही इंतजार है, शायद उसके प्रयास से ही कोई समझे हम लोगों की व्यथा, कोई तो निकाले उसका हल"!
मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर )