बहुत याद आती है पुराने मकानों की छतों पर गुजरी वो पुरानी यादें
पहले झाड़ू से छत को साफ़ करने की मुहिम, फिर पानी की बाल्टी से छिड़काव और अंत में उस पानी के सूखने पर उठने वाली भीनी-भीनी खुशबू,
दरियाँ बिझा कर लाइन से बिस्तर बिछाने की क़वायद, पानी की सुराही के मुंह को लोटे से ढंक कर रखने के जतन,
लेट कर दिखाई देने वाले वो चमकीले तारे,
रात भर बजता वो नीम का पेड़,
कभी आधी रात को मौसम ख़राब होने पर वो अपने -अपने बिस्तर समेट कर नीचे भागने की जल्दी...
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कितना कुछ निगल गई है इन ए .सी. कमरों की घुटन।
...
काश,
वो वक्त फिर से आ जाए, जहाँ कम जगह में ज्यादा लोग रह लेते थे,
एक ही सब्जी के साथ छक कर खाना खा लेते थे,
सब आपस में बोलते-बतियाते थे,
मस्ती और शैतानियां तो खूब थी मगर छल-प्रपंच कोई नहीं जानता था। ठहाकों की गूंज पूरे in मोहल्ले में सुनाई देती थी।
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सच,
कितना कुछ निगल गई है इन ए.सी. कमरों की घुटन..
अनुराग ठाकुर (औरैया)

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