मात-पिता के रिश्ते की जो ना जाने कद्र वो कुलांगार है ,
सच्चा रिश्ता वो होता है जो रिश्तों की माला करता कण्ठागार है ,
रिश्तों को रखें उलझाए हर पल जो वो रिश्तों का कसूरवार है ,
कभी हद से बढ़ जाती उलझन रिश्तों में तो लगता कारागार है।
रिश्तों को निभाना होता है दिल से यहां ना कोई रिश्तों का कामगार है ,
जब कूट- कूट भरा होता है प्यार- विश्वास वहां दिल बनता रिश्तों का ओगार है ,
ना उलझनें देना कभी रिश्तों को , ये रिश्ते खुशी के तलबगार है,
जो सींचे प्यार के पानी से रिश्ते के पौधे वो ही करूणागार है ।
जो ना समझो पाया अहमियत रिश्तों की उसका जीवन कगार है,
वो रहता ताउम्र जिंदगी से शर्मसार है,
इन प्यारे-प्यारे रिश्तों से मुंह मोड़ना तो बेकार है,
परवरदिगार ने बक्शे हैं ये प्यारे रिश्ते इन्हें निभाने वाले हम तो बस किरदार हैं।
मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर )

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