क्यूँ लोगों को एक बार में लेखक की मौलिक छवि समझ में नहीं आती, कुछ महानुभावों को पहले ज़िल्लत ओर बाद में नवाजिश मिली ऐसे बहुत से लेखक है उनमें से एक उर्दू के बेहतरीन ओर बेबाक लेखक हसन मन्टो के ख़िलाफ़ बोल्ड लेख लिखने के विरुद्ध में केस हुआ,उनका लिखा बाद में 17 भाषाओं में अनुवादित हुआ और बेस्ट सेलर साबित हुआ। कितनी बायोपिक और शोर्ट फिल्म बनी। वैसे समाज खुद को बोल्ड ओर खुले विचारों वाला दिखाने में माहिर तो है, बोल्ड बातें ओर कहानियां चटकारे लेकर पढ़ते है पर लेखक के उपर ऊँगली उठाने में बिलकुल देर नहीं करते।
गुजराती लेखक चंद्रकांत बक्षी पर भी उनकी कहानी "कुत्ती" के विरुध्ध में केस हुआ था, टैगोर जी को भी उस ज़माने में "चोखेर बाली" लिखने पर आधुनिक बोलकर चर्चा की तलवार पर लटकाया गया।
अश्लीलता क्या होती है? कलात्मक शब्दों को सजाकर लिखी गई रचना को नंगी सोच के साथ पढ़ने वाले शृंगार रस को कभी नहीं समझ पाएँगे। एक स्त्री के शरीर को एक ही निगाहों से तोलने वालों की नज़रों में शृंगार रस अश्लील है, और उस पर भी अगर स्त्री शृंगार रस लिखती है तो खाँखें चौंधिया जाती है। उपर वाले ने स्त्री के उसी हिस्से को मातृत्व से नवाज़ा है, एक जीव का सर्जन वहीं से होता है जिसे कुछ लोग सिर्फ़ वासना सभर द्रष्टि से देखते है।
उरोज को बच्चे के पोषण का हिस्सा बनाया अगर ये हिस्से अश्लील है तो ईश्वर गुनहगार है। गीत गोविंद हो, कालिदास के नाटक हो, या वाल्मीकि कृत रामायण हमारे साहित्य की धरोहर में कहीं ना कहीं शृंगार रस की सुंदर सी छवि झलकती है। राधा का रुप, सीता की सौम्यता और द्रौपदी की कमनियता का वर्णन बखूबी किया है। इस युग से तो वो युग ज़्यादा आधुनिक था कृष्ण-द्रौपदी राधा-कृष्ण उनके रिश्ते पर किसीने ऊँगली नहीं उठाई थी उस रिश्ते को हम आज भी पूजते है।
कब तक साहित्य को समझे बिना कुछ लोग अपनी संकुचित मानसिकता के चलते लोगों को भड़काते रहेंगे। क्यूँ आज 21 वी सदी में भी एक स्त्री और पुरुष के रिश्ते को शक भरी निगाहों से ही देखा जाता है, क्यूँ इस विषय में हम बच्चों से खुलकर बात नहीं कर सकते।
यहाँ मुझे वर्ल्ड बेस्ट लेखिका अम्रिता प्रीतम जी की याद आ रही है। पहले उनके विचारों को बोल्ड दर्शाते केस हुए, आक्षेप हुए और बाद में ज्ञानपीठ अवॉर्ड ओर पद्मश्री से सम्मानित किया गया। ओर आज उनकी एक-एक रचनाएँ लोगों को प्रेरित करती है।
स्त्री के हर पहलू को गंदी सोच, गंदी नज़र से देखने वालों को ओर शृंगार को वासना का रुप देने वालों को क्या कहेंगे ? एसे विवेचकों की सोच के पीछे कौन से संस्कार काम करते है, क्या एसी सोच वालों को उनकी माँ, बहन, बीवीयाँ टोकती नहीं होंगी, या फिर टोकने पर एसे लोग अपने घर की औरतों को चुप करा देते है।
जो स्त्री मर्दों की प्रतिक्रिया से ना डरकर बेबाक और मुखर लिखती है उसके खिलाफ मोर्चा निकाल कर स्त्री के लिए उतरती भाषा प्रयोग करने वाले शायद असुरक्षा की भावना से पीड़ित हो। स्त्री की सफलता ओर प्रसिद्धि कहाँ हज़म होती है कुछ एक मर्द को।
जो भी हो पर एक स्त्री लेखिका आज भी शृंगार रस या किसी बोल्ड विषय पर लिखने से पहले एक बार सोचती जरूर है की मेरा लिखा पढ़ने पर मेरे घर के मर्दों के प्रतिभाव कैसे होंगे या मेरा पति इस बारें में क्या सोचेगा, हर शब्द को तोल मोल कर लिखती है।
कृष्ण प्रेम में पागल मीराबाई को सबने पहले गालियाँ दी ज़हर तक पिलाया आज उसी मीरा के कृष्ण प्रेम में लिखे गए पद को श्रद्धा से नमन करते है।
पर खैर कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना। लेखकों को अपनी कल्पनाओं को परवाज़ देकर अपने लेखन में हर विषय पर प्रयोग करते लिखना चाहिए। एसी कोन्ट्रोवर्सी से प्रसिद्धि ही मिलती है लोग ढूँढ ढूँढ कर आपकी वो रचनाएँ पढ़ेंगे ओर आपकी आधुनिक विचारों को दस में से पाँच लोग भी अपनाते है तो आपका लिखा सार्थक है।
सबको चटपटा पढ़ना पसंद है पर उससे ज़्यादा पढ़ कर आलोचना करने में ज़्यादा रस होता है, दो मुँह वाली दोरंगी दुनिया को सलाम।।
(भावना ठाकर,बेंगुलूरु)#भावु

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