आज की कविताओं में विनोद का ज़माना है , लेखक परोसे, पाठक पढ़ें, श्रोता बनता विनोद का सारा जमाना है । अब ना सच्चा विनोद है साहित्य में, ना सच्चा विरोध रहा, कहीं साहित्य बिक रहा, कहीं साहित्यकार बिक रहा।
छींटाकशी और विनोद की कविताओं में ना कोई सीमा - रेखा है । जहां मिले माया वहां साहित्यकार खूब विनोद, छींटाकशी उड़ेलता है, कहीं साहित्यकार से ही खुद अपना साहित्य बेचने को मजबूर किया जाता है। किए जाते हैं साहित्यिक उत्सव , कलमकारों का उत्साह वर्धन होता है,
जैसे त्योहारों के उत्सव में बच्चों का लगता तांता है ।
अमीर मनाए उत्सव तो विनोद का समां बंध जाता है , रहती ना कोई सीमा- रेखा विनोद की सब दुःख दूर भाग जाता है ।
ग़रीब मनाए कैसे उत्सव कोई उसकी तो तनख्वाह भी तो बेमानी है , कहीं फीस बच्चों की है भरनी, कहीं अन्य भत्तों का भी पलड़ा भारी है ।
दूध, किराया, राशन और बचा खुचा मरहम पट्टी और दवा का बिल उससे भरा जाता है ।
आज के समय में मनाना हो उत्सव तो सीखो आज के तेवर तुम , तनख्वाह के साथ- साथ ऊपर का पैसा कमाना पड़ता है ।
मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर )

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