कहते सुना है लोगों को हम लिखते हैं,
रो दे पड़ने वाला वो अफसाना लिखते हैं।
बर्बाद होना पड़ता है प्यार में हमेशा,
वरना आसानी से रिश्ते कहां निभते हैं।
प्यार में यार के इस क़दर डूबे हैं हम,
खड़े उसके लिए सरे बाज़ार बिकते हैं।
रोते हैं चुपके-चुपके याद में उसकी हम,
मगर सारे जहां को हंसते हुए दिखते हैं।
कहने को तो सोते हैं मखमल के गद्दे पर,
जुदाई में यार की अंगारों पर सिकते हैं।
ढुंढते फिर रहे हैं उन्हें कुल जहां में हम,
इसलिए एक जगह कहां हम टिकते हैं।
पढ़ोगे "प्रेम" को तो रो दोगे तुम भी
वो दर्दे-दिल, ज़ख़्म-ए-जिगर लिखते हैं।
मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर )

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