Saturday, October 31, 2020

मौन के भी शब्द होते कभी सुनो तो सही-प्रेम बजाज



मौन के भी शब्द होते हैं कभी सुनो तो सही ,
मेरी आंखें माना मौन है , मगर सपने तो वो भी बुनती है ,
तुम कहते हो मैं नहीं चलुंगा तुम्हारे संग इन वादियों में ,
मैं मौन होकर चल देती हूं अकेली ,
तुम कहते हो मैं चलूं तुम्हारे संग हर पथरीली राह पर ,
मैं मौन हो चल देती हूं संग तुम्हारे ,
मौन का अर्थ ये नहीं कि वो पथरीली राहें मुझे चुभती नहीं ,
करते हो तिरस्कार मेरा सरे महफ़िल ,
मैं रह जाती हूं मौन तो क्या मुझे तकलीफ़ नहीं ,
छु लेती हूं तुम्हें तो कर लेते हो किनारा ,
कभी बुझा कर अपनी पिपासा मोड़ लेते हो मुंह ,
कभी तो बन बदरा प्रेम सुधा रस बरसाओ ना ,
प्यासी धरा सी रह जाती हूं मौन तो क्या मेरे अहसास नहीं ?
जिस दिन दे दिए शब्द मैनें अपने मौन को आ जाएगा एक ज़लज़ला ,
बह जाएगा जिसमें सबकुछ , सुनोगे जिस दिन मेरे मौन की गुंज ,
बहरे हो जाओगे मेरे मौन के शब्दों से , इसलिए मुझे मौन रहने
पर इतना मजबूर ना करो , मेरे मौन के शब्द सुनो ।


मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर )

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