Monday, December 21, 2020

21वीं सदी की बुलबुल-प्रेम बजाज




हैलो .......""शीतल बिटिया कहां हो, कब तक पहुंचोगी , कब से राह तक रहे हैं ?
""बस मां दस मिनट में पहुंच जाएंगे , अभी - अभी बस से उतरे हैं बस रिक्शा किया और सीधा आप लोगों के पास ।
दस - पंद्रह मिनट बाद शीतल अपने मायके पहुंची जाती है , मां - पापा ,भाई - भाभी , बच्चों से सबसे मिलती है  उसका बेटा सौरभ भी सबसे मिलता है ।  
""अरे बुलबुल दिखाई नहीं दी वो कहां है ,बाहर है क्या ??
""नहीं, बुलबुल घर पर ही है, उसे नहीं लाई।
""कितनी बार कहा है उसे यूं अकेला ना छोड़कर आया कर लेकिन तु है कि सुनती ही नहीं । 
""अरे मां  बुलबुल अकेली कहां है दादा - दादी  , चाचा , बुलबुल के पापा सभी तो हैं , और छोटी बुआ भी तो शहर में ही रहती है वो भी अक्सर आ जाया करती है ।  और वो गौरव जो मेरी बड़ी ( जीजी ) ननद का बेटा वो तो बहुत ख़्याल रखता है बुलबुल का ।   
""हे भगवान् ना जाने कब समझेगी ये लड़की, आज के वक्त में अपने जाए पर तो भरोसा नहीं और तु चली औरों पे भरोसा करने । 
""ओफ्फो मां , अब छोड़ो भी, कुछ नाश्ता - वाश्ता कराओ भूख लगी है ।
प्रेम ( शीतल की मां ) नाश्ता बना रही है और खो जाती अपने जीवन के उन दिनों में जो नासूर बन कर उसे हर पल कटोचते हैं ।  उसकी बुआ का लड़का ( गोविंद ) भी तो उन्हीं के घर में रहता था , बहुत भरोसा था सभी को उस पर तभी तो कहीं भी जाना हो  गोविंद के साथ उसे भेज देते थे , खुद कहीं जाना है तो घर पर गोविंद के  सहारे छोड़ कर निश्चिंत हो जाते थे , कहते थे गोविंद भाई है ना तेरे साथ , वो तेरा अच्छे से ध्यान रखेगा ‌ , लेकिन कोई नहीं जानता था कि कैसा ध्यान रखता था वो घर पे अकेले होते जब,   कभी उसके शरीर पर हाथ फिराता , कभी उसकी छाती को चुमता , कभी उसके गुप्तांग को हाथों से सहलाता और साथ में कहता   ""मां को मत बताना वरना मां तुम्हें ही  डांटेगी , उससे बात करते हुए गंदे- गंदे शब्दों का इस्तेमाल करता , फिर कहता ये शब्द कितने अच्छे हैं ना पर मां को मत बताना  , हर बात नहीं बताया करते , और वो चुप रह जाती ।
""मां आप भी आओ ना सब मिलकर नाश्ता करते हैं  ।
"" अं ..... हां हां आई ........आई ‌।
सभी नाश्ता करते हैं मिल बैठ कर लेकिन प्रेम का मन कहीं और भटक रहा है । जल्दी से सारा काम निपटा कर  शीतल और प्रेम दोनों मां - बेटी आ बैठती है कमरे में , सौरभ मामा - मामी  से बातें कर रहा है और शीतल मां से ।
""मां कहां खो जाती हो , क्या हो जाता है आपको बुलबुल की इतनी चिंता क्यों करती हो , वो अब छोटी बच्ची नहीं है ‌।
"" शीतल, बेटा तुम बहुत भोली है, इस तरह लड़की जात को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए,  मुझे पता है अब तुम कहेगी सब तो हैं उसके पास,  मैं जानती हूं सब हैं , लेकिन तु तो नहीं ना ।
"" मां आप बेकार में चिंता करती हो, बुलबुल भी आप ही की तरह स्ट्रांग है , तभी तो आपके बचपन का नाम बुलबुल मैंने उसका नाम रखा ।
"" तुझसे कितनी बार कहा मेरे बचपन की कोई बात ना किया करो ।
"" क्यों मां , आप हमेशा ऐसे कह के मुझे चुप करा देते हो, आज आप को बताना होगा कि आखिर क्या ऐसा दु:ख  है जो आपको अन्दर ही अन्दर साल रहा है ।
प्रेम शीतल को अपने बीते कल की सारी घटनाएं बताती है ।
"" तुमने अपनी बेटी का नाम बुलबुल इसलिए रखा कि मुझे बचपन में बुलबुल बुलाते थे सब , तु कहती हैं ना कि मां मैं भी अपनी बेटी को इस बुलबुल जैसा स्ट्रांग बनाऊंगी ।
तो सुन ये बुलबुल बचपन में इतनी स्ट्रांग नहीं थी जितनी अब हो गई है। ज़माने ने इसे पत्थर बना दिया है ।
मेरी बुआ का लड़का हमारे ही घर रहता था , और उसके बारे में सब कुछ बताया शीतल को कि वो प्रेम के साथ कैसे और क्या किया करता था , उसके बाद चाचा की शादी थी , उसने भी हाथ आजमाने के लिए उसे ही चुना उस पर अपने तरीके अपनाता कि वो अपनी बीवी के साथ  गृहस्थ कैसे रहेगा। तब भी उसे किसी से कुछ ना बताने को मजबूर किया गया।
छोटे मामा नानी के कहने से बाहर थे उन्हें समझाने के लिए हमारे यहां पिताजी के पास भेजा गया, मामा ने भी जब - जब अकेली देखा, कभी होंठों का रस पिया तो कभी जिस्म पे हाथ फेरा।
जो भी रिश्तेदार आता हर कोई किसी ना किसी बहाने प्यार से और कोई नज़रों से बदन को छू जाता ।
"" हे भगवान्  मां आप ने इतना सहा, विरोध क्यूं नहीं किया किसी का ?
"" बेटी , विरोध करना औरत के नसीब में इश्वर लिखना भूल गया था।
विरोध करती , आवाज़ उठाती भी तो किसके खिलाफ , सभी पीड़ा देने वाले  अपने सगे ही तो थे , किसकी शिकायत किससे करती ।
इसलिए मुझे इस बुलबुल नाम से ही भय लगता है, जो मेरे साथ बीता वो तेरे साथ ना हो, इसलिए मैं एक पल के लिए भी कभी तुझे अकेला नहीं छोडती थी , कहीं भी जाती थी , तुझे हमेशा साथ लेकर जाती, कि कहीं ऐसा ना हो , फिर से वही पीड़ा सामने आए । इसलिए तुझे हर बार यही कहती हूं बुलबुल को अकेला मत छोड।
"" नहीं मां मैं बुलबुल के साथ ऐसा नहीं होने दूंगी। मैंने बुलबुल को सब समझाया हुआ है , हमारी बुलबुल गुड टच, बैड टच , अच्छा क्या , बुरा क्या , किस की हरकत किस हद तक बर्दाश्त करनी है, किसे पलट कर कैसे और कब, कहां वार करना है , ये सब जानती है , और आजकल तो स्कूलो में भी बच्चों को ऐसे विषयों पर जानकारी दी जाती है।
मां ये आज की बुलबुल है , 21 स्वीं सदी की बुलबुल, जो ना जुल्म सहेगी और ना किसी को  सहने देगी ।
इंट का जवाब पत्थर से देगी , वहशी दरिंदों को सबक सिखाएगी।
         ये 21सवी सदी की बुलबुल है । 



मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर)

उत्सव एक अलग की कला-प्रेम बजाज




आज की कविताओं में विनोद का ज़माना है , लेखक परोसे, पाठक पढ़ें, श्रोता बनता विनोद का  सारा जमाना है । अब ना सच्चा विनोद है साहित्य में, ना सच्चा विरोध रहा, कहीं साहित्य बिक रहा, कहीं साहित्यकार बिक रहा।
छींटाकशी और विनोद की कविताओं में ना कोई सीमा - रेखा है  ।   जहां मिले माया वहां साहित्यकार खूब विनोद, छींटाकशी उड़ेलता है,  कहीं साहित्यकार से ही खुद अपना साहित्य बेचने को मजबूर किया जाता है। किए जाते हैं साहित्यिक उत्सव , कलमकारों का उत्साह वर्धन होता है, 
जैसे त्योहारों के उत्सव में बच्चों का लगता तांता है ।
अमीर मनाए उत्सव  तो विनोद का समां बंध जाता है , रहती ना कोई सीमा- रेखा विनोद की  सब दुःख दूर भाग जाता है ।
ग़रीब मनाए कैसे उत्सव कोई उसकी तो तनख्वाह भी तो बेमानी है , कहीं फीस बच्चों की है भरनी, कहीं अन्य भत्तों का भी पलड़ा भारी है ।
दूध, किराया, राशन और बचा खुचा मरहम पट्टी और दवा का बिल उससे भरा जाता है ।
आज के समय में मनाना हो उत्सव  तो सीखो आज के तेवर तुम , तनख्वाह के साथ- साथ ऊपर का पैसा कमाना पड़ता है ।


मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर )

Sunday, December 20, 2020

हम जो उतरे सागर में साहिल पे-प्रेम बजाज



हम जो उतरे सागर में साहिल पे खड़े लोग देखा किए ,
मौजों ने लगाया पार हमें साहिल ने फिर मझदार में ला खड़ा किया ।
ना -खुदा के ज़ुल्मों - सितम का करूं क्या मैं बयां ,
सितम तो मुझ पर अपनों ने ही किये ।
माना कि हम दो किनारे हैं दरिया के मिलना मुमकिन नहीं
चलते हैं साथ ये भी तो कम नहीं ।

रहते हो ख़्वाबगाह में भी किनारे की तरह ,
एक किनारा खामोश और एक सिसका किए ।
फ़ना हो कर इश्क में तुम्हारे तड़फते रहते हैं रात भर
यूं ही तेरी आंखों के समुन्दर में डूब जाने के लिए ।
सारा जहां बेशक कर ले किनारा तुझसे मेरा साथ ना छुटेगा
दो किनारों सा है प्यार हमारा संग रहा , संग रहेगा ।

लहर नहीं मैं कश्ती हूं प्यार के समुन्दर की, लहर तो आकर लौट जाती है ,
कश्ती किनारे का साथ सदा रहता है ।
नहीं होश कोई हम दोनों को ,इस प्यार की उफ़नती नदी का
पानी मदहोश किए जाता है छु कर तुझे , मुझे आ छुता है ।
हम दो किनारे मिलकर बिछड़ने के लिए , बिछड़ कर मिलने के लिए ,
ये लहरें कुछ तुमसे ले आती हैं , कुछ मुझको दे जाती हैं ,
यही तो हमारा प्रेम है , दो किनारों का अमर प्रेम ।


मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर )

Monday, December 14, 2020

संघर्षों के साथ जीवन यापन की कला-अनुराग ठाकुर

संघर्षों के साथ जीवन यापन की कला


जीवन संघर्ष का दूसरा नाम है ,हाँ जी संघर्ष ही जीवन है ।संघर्ष! यह एक ऐसा अनुभव है जिससे शायद ही दुनिया का कोई व्यक्ति वंचित रहा होगा। हम सब को बचपन से ही सिखाया जाता हैं कुछ भी पाने के लिए संघर्ष करना ही पड़ता है। बिना संघर्ष कभी कुछ हासिल नहीं कर सकते समाज में प्रतिष्ठा, नाम-शोहरत, रुपया-पैसा, तरक्की या फिर पढ़ाई में अव्वल होना हो, चाहे जो भी लक्ष्य हो उसे प्राप्त करना बिना संघर्ष के संभव नहीं।
इसमें कोई दोराह नहीं की संघर्ष जीवन को तराशता है, निखारता है, सँवारता है और फिर हमें ऐसे साँचे में गढ़ता है जिसकी प्रसंशा दुनिया करते हुए नहीं थकती। शायद यही वो मुकाम या मंजिल होती है जिसके लिए मनुष्य भरशक प्रयास करने से पीछे नही हटता है जिसे हम संघर्ष कहते हैं। इसके पश्चात जो सफलता प्राप्त होती है निसंदेह वो अतुलनीय होती हैं। संघर्ष ही है सफलता की कुंजी है । संघर्ष जीवन के उतार-चढ़ाव का अनुभव कराता है, अच्छे-बुरे का ज्ञान करवाता हैं, सतत सक्रिय रहना सिखाता है, समय की कीमत सिखाता है जिससे प्रेरित होकर हम सशक्तिकरण के साथ फिर से अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित होते है और जीवन जीने के सही तरीके को सीखते हैं। दुनिया का हर व्यक्ति जीवन में सफलता की उम्मीद करता हैं जिसके लिए वो अथक प्रयास भी करता है। कई बार कुछ अलग करने की चाह और प्रबल प्रेरणा से व्यक्ति अपने मुकाम के करीब पहुँच भी जाता है लेकिन कुछ कठिन संघर्ष को सामने देख सफलता से वंचित हो जाता है।
और वह नहीं जान पाते की उनके साथ ऐसा क्यों हुआ ,जिस कारण उनके सपने अधूरे के अधूरे रह जाते है और जीवन के अंतिम पलों तक उनकी इच्छाएँ आधी-अधूरी रह जाती है। ऐसी इच्छाएँ उन्हें अपने जीवन से निराश के मोड़ पर लाकर के खड़ी कर देती है क्योंकि अधिकांश लोग अपने संपूर्ण जीवन में यह जान ही नहीं पाते की सफलता कैसे हासिल करें । जीवन ‘संघर्ष’ का दूसरा नाम हैं। एक बात हमेशा याद रखिए, अपनी मंजिल का आधा रास्ता तय करने के बाद पीछे ना देखे बल्कि पूरे जुनून और विश्वास के साथ बाकी की आधी दूरी तय करे, बीच रास्ते से लौटने का कोई फायदा नहीं क्योंकि लौटने पर आपको उतनी ही दूरी तय करनी पड़ेगी जितनी दूरी तय करने पर आप लक्ष्य तक पहुँच सकते है। आगे बढ़कर भी अगर सफलता ना मिल पाई तो भी कोई बात नहीं कम से कम अनुभव तो नया होगा। बार-बार हार के भी हिम्मत के साथ अपने टारगेट की तरफ कदम बढ़ाना ही संघर्ष है। अपनी हर असफलता से कुछ सीखिए और निडरता के साथ संघर्ष का दामन थाम के मंजिल की ओर आगे बढ़िए।
जब तक जीवन में संघर्ष नहीं होता तब तक जीवन जीने के अंदाज को, सच्ची खुशी को, आनंद को, सफलता को अनुभव भी नहीं कर सकते। जिस तरह बिना चोट के पत्थर भी भगवान नहीं होता। ठीक उसी तरह मनुष्य का जीवन भी संघर्ष की तपिश के बिना ना तो निखर सकता है, ना शिखर तक पहुँच सकता है और ना ही मनोवांछित सफलता प्राप्त कर सकता है। क्योंकि ”संघर्ष हमारे जीवन का सबसे बड़ा वरदान है और वो हमें सहनशील, संवेदनशील और देवतुल्य बनाता हैं।” जीवन में संघर्ष करते वक्त एक बात का सदैव ध्यान रखें कि लोग आपकी प्रशंसा कर रहे या बुराई क्योंकि ये दुनिया की रीति है यदि आप अपने मन से कुछ अच्छा करने की विचारधारा को लेकर प्रयास करने को लेकर कदम को बढ़ाया यदि आपको उसमें सफलता मिल गई तो आपकी प्रशंसा के अंबार लग जायेंगे वहीं यदि आप किसी कारण वश अपने मुकाम तक नही पहुँच सके तो आपको बुराइयों के साथ साथ ताने सुनने से कोई नही रोक सकता है तो आपको इतना याद रखना है कि आपको उनकी नकारात्मक सोच को पीछे छोड़ अपने तक पहुँचने में फिर से अथक प्रयासों में लग जाना है संघर्ष के इस सूत्र को समझिए और उसपर चलने की कोशिश कीजिए। यकीन मानिए आप जीवन को एक अलग रूप से देखने लगेंगे।

अनुराग ठाकुर (पत्रकार)
                           औरैया-उत्तर प्रदेश

Saturday, December 5, 2020

छोड़ दो अब तो बहुत हुआ-प्रेम बजाज


 


मत जकड़ो मुझे इस तरह ,छोड़ दो अब तो बहुत हुआ 
ना सताओ मुझे बक्श दो अब तुम्हारा ज़ुल्म बहुत हुआ ।

मैं  वो इन्सान हूं जिसने नहीं सताया  कभी किसी  बेजुबान को ,
नहीं कभी प्रकृति को कोई कष्ट पहुंचाया मैंने, तो क्यों  दी 
जा रही मुझे सज़ा ।

मैंने तो कोई बिमारी नहीं फैलाई , किसी मासूम का कत्ल 
नहीं किया , नहीं किसी अबला पर ज़ुल्म किया ,ना ही किसी की 
आबरू  का कत्ल किया, नहीं किसी के मुंह से छीना निवाला ।

फिर मुझे  क्यों दी जा रही है सज़ा , क्यों मुझ पे ये  आपदा आई 
क्यों मुझ पर डा रहे हो कहर, क्यों बना कठपुतली नचा रहे हो मुझे 
बस करो छोड़ दो अब तुम्हें खुदा का वास्ता , अब बहुत हुआ ।

हे ईश्वर अब तो मुझ पर करो रहम , मुझे निकालो इस मकड़ी जाल
से , बस अब बहुत हुआ ।


मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर)

Thursday, December 3, 2020

एक लड़की पहेली सी -प्रेम बजाज




मै जब भी आफिस जाता , अक्सर बस स्टैंड पर एक लड़की मुझे नज़र आती , जैसे ही बस आकर रूकती, हम सब में बस पे पहले चढ़ने की होड़ सी लग जाती , लेकिन वो इत्मीनान से खड़ी रह कर पहले औरों के चढ़ने देती और फिर खुद चढ़ती, और अगर बस मे जगह ना हो तो वो नीचे ही खड़ी रह जाती , अगर चढ़ जाती तो कोई बुज़ुर्ग या बच्चा होता तो बैठने के लिए पहले उसे सीट देती ।

अक्सर मैं देखता बस मे अगर किसी का बच्चा परेशान करता या रोता तो ना जाने क्या जादू था कि वो उसे गोद में लेकर झट से चुप भी करा देती और बैग से निकाल कर उसे चाकलेट भी देती ।मै बस उसे देखता ही रहता , कई बार मन चाहा कि उससे बात करू, मै दिल ही दिल मे उसे चाहने लगा था । लेकिन अचानक कुछ दिनों से वो नज़र नहीं आई, आँखे रोज़ उसे उसी बस स्टैंड पर ढुँढती ,पर पुछु तो किससे , कोई भी कुछ भी नहीं जानता था उसके बारे में ।

एक दिन मैं दोस्तो के साथ किसी होटल मे खाना खाने गया तो अचानक मेरी नज़र सामने के टेबल पर पड़ी वही लड़की लाल सुर्ख जोड़े में गहनों से लदी थी , और उसके साथ एक अधेड़ उम्र का शक्स , दिखने मे कुछ अजीब सा भी था ,हाव-भाव से लग रहा था कि पति-पत्नि हैं , लेकिन लड़की के हाव-भाव से पता चल रहा था कि वो खुश नहीं है । मैने सोचा एक बार मिला जाए लेकिन इतने मे वो उठ कर चले गए और वो लड़की मेरे दिल पर एक छाप छोड़ गई, जो हर समय हँसती रहती थी , वो आज खोई-खोई सी लग रही थी , ना जाने क्या थी उसकी कहानी, एक पहेली सी बन कर रह गई वो लड़की मेरे लिए ।



मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर )

Monday, November 30, 2020

दिल की दुविधा-प्रेम बजाज




हरीश बजाज प्राइवेट दफ़्तर में क्लर्क बाबु की नौकरी , दो बेटे, बड़ा गौरव , छोटा सौरभ मन में चाह कि बच्चों को अपने जैसा क्लर्क नहीं बनाना , इसलिए ओवर टाइम भी करता था , पत्नी भी लोगों के कपड़े सिला करती थी , ताकि बच्चों को अच्छी तालीम दे सके ।
दोनों बेटे पढ़-लिखकर ऊंची पोस्ट पर बड़ी-बड़ी कम्पनियों में नौकरी करने लगे पिता ने रिटायर होने के बाद दोनों बेटों में सबकुछ बांट दिया ।

सुनो," सब कुछ मत बांटो बच्चों में कुछ तो अपने लिए रखो , कल को अपने बुढ़ापे के लिए"!
"तुम तो ऐसे ही चिंता करती हो बुढ़ापे के लिए बच्चे हैं ना हमें किस बात की चिंता"!
शुरू में दोनों बच्चों ने खूब प्यार दिखाया फिर पुश्तैनी घर भी जब बंट गया दोनों में , मां - बाप ने सोचा, चलो अब बच्चों के साथ ही रहा जाए , कभी एक के कभी दूसरे के पास। गौरव दिल्ली , सौरभ मुम्बई हरीश ने दोनों बेटों से बात की।
गौरव, "सौरभ क्या तुम दोनों को रख सकते हो ? मेरा तो मुश्किल है इतनी मंहगाई उस पर से बच्चों की भी अब बड़ी क्लासे हैं उनके भी तो खर्चे हैं"!
"तो भैया मेरा भी तो यही हाल है"!
" तो ऐसा करते हैं एक को तुम रखो एक को मैं"!
" हां ये ठीक रहेगा , ना आप पर ज्यादा बोझ पड़ेगा ना मुझ पर ‌ पापा को मैं रख लेता हूं आप मां को ले जाओ"!
लाचार मां - बाप दो हिस्सों में बंट गए, कुछ समय बाद हरीश की तबीयत बहुत बिगड़ गई, डाक्टर ने बताया कुछ पता नहीं कब तक हैं।
दोनों की इच्छा है कि अंतिम समय में तो साथ रहे, लेकिन दोनों को रखने के लिए कोई राज़ी नहीं।
"गौरव बेटा, तेरे पापा का कुछ पता नहीं कब क्या हो जाए, हम चाहते हैं अन्तिम समय में हम साथ रहे"!
"मां आप जानते हो दो का खर्च ना मैं उठा सकता हूं ना सौरभ और फोन पर तो रोज़ बात कर ही लेते हो। ज्यादा है तो आप मेरे फ़ोन से वीडियो काल कर लिया करो लो मैं अभी आपकी बात कराता हूं"!
फ़ोन पर दोनों विडियो काल पर बात कर रहे हैं ।
हरीश ... "आशा तुम्हें देख कर बहुत मन खुश हो गया, ऐसा लग रहा है जैसे हर एक - दुजे के पास हैं"!
"हम पास ही तो हैं दूर कहां है, ये तो सिर्फ राहों की दूरियां हैं दिलों की नहीं"!
"आशा तुम्हें याद है, कभी - कभी तुम एक गीत गुनगुनाया करती थी"!
" वो मैं कैसे भूल सकती हूं अब तो हर पल वहीं गीत गुनगुनाती हूं"
"आज फिर से वही गीत सुनने का मन है, मैं भी तुम्हारे साथ गाऊंगा"
दोनों गाने लगते हैं .......
##तेरे बिना ज़िंदगी से शिकवा तो नहीं , शिकवा नहीं , शिकवा नहीं , तेरे बिना ज़िंदगी भी लेकिन ज़िन्दगी तो नहीं ##
गाते -गाते हरीश ख़ामोश हो गए,  आगे तो गाईये भूल गए क्या,  गौरव के पापा बोलिए ना क्या हुआ, लेकिन वो तो खामोश हो गए सदा के लिए और इसके साथ ही आशा  की आत्मा भी विलिन हो गई परमात्मा में!
 यह देख गौरव रो रहा है, गौरव का बेटा साहिल .... ‌ पापा ……… "क्यों रो रहे हैं आप , अब तो कोई दूविधा ही नहीं रही कि दोनों को एक साथ कैसे रखें, लेकिन मेरे  दिल में एक दूविधा है, क्या दादू - दादी को वहां  भी अलग -अलग रखा जाएगा या वहां दोनों एक साथ रह सकते हैं ,साहिल की  आंखों में बहुत से सवाल नज़र आए गौरव को, लेकिन वो उसके  दिल की दूविधा को  मिटाने में असमर्थ था।


मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर)

गर्ल चाइल्ड डे-प्रेम बजाज

सुनो-सुनो ए भारत की नारी , नहींं रही अब तु बेचारी क्यों जन्म से पहले ही कोख में बेटी को मार जाता है । तुम भी तो एक बेटी हो तभी गर्भ धारण ...