Sunday, January 24, 2021

गर्ल चाइल्ड डे-प्रेम बजाज





सुनो-सुनो ए भारत की नारी , नहींं रही अब तु बेचारी
क्यों जन्म से पहले ही कोख में बेटी को मार जाता है ।
तुम भी तो एक बेटी हो तभी गर्भ धारण करने
का सौभाग्य मिला , कर्ज़दार हो उस इश्वर के
जिसने तुम्हें इस लायक समझा ।

मां को तो जन्म देने का अधिकार दिया ईश ने
अजन्मी बेटी को मारने का हक तुम कहां से ले आए ।
जो कहते बेटी महमान है , ग़र चली जाती है बेटी
तो क्या बेटे रूख़्सत नहीं होते , छोड़ कर उनके जाने
पर क्या उनके माँ-बाप नहीं रोते ।

बेटी सयानी होने पर अब किसी बाप के कँधे नहीं झुकते
अब तो बेटियां लहराती है परचम गर्व के , तोड़ देती है दम्भ
दरिन्दो ,लोभियों के ।
ग़र मारोगे कोख़ मे बेटी ,बहु कहाँ से लाओगे ।
बेटी को जीने का अधिकार दे दो , बस थोड़ा सा उसे प्यार दे दो ।
ग़र कर नहीं सकते तुम रक्षा बेटी की, दे नहीं सकते जीने का अधिकार उसे
तो किस हक से बालिका दिवस मनाते हो,
करते हो कन्या का पूजन मान देवी उसे उसके भक्त बन जाते हो।
एक तरफ तो करते पूजा बेटी की,
मगर दूजे की बेटी पर रख बुरी नज़र उसे फूल जैसा मसल डालोगे
तो भला अपनी बेटी की रक्षा कैसे कर पाओगे।
एक दिन गर्ल चाइल्ड डे मनाने से क्या होगा,
भला साल भर की अजन्मी कत्ल हुई, बलात्कार की शिकार,
तेज़ाब से जली बेटियों को क्या जीवन दे पाओगे।
ग़र नहीं तो छोड़ दो ढोंग ये (बेटी दिवस ) गर्ल चाइल्ड डे मनाने का। 🙏🏻



मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर)

Friday, January 22, 2021

नज़्म-प्रेम बजाज





ए वक्त ज़रा ठहर जाने को क्यूं बेकरार हुआ जाता है
आएगा मुझसे मिलने जिसके दिल से मेरा नाता है ।

हो गया है प्यार मुझे उनसे इसलिए बेताब हूं मैं
प्यार में ही तो इन्सान दिल की बाज़ी लगाता है ।

हार बैठा हूं सब कुछ अपना मोहब्बत में उनकी
मोहब्बत में हार कर ही तो जीता जाता है ।

ना कोइ शिकवा , ना शिकायत , ना ही गिला किया
क्यों कि प्यार में तो हर कोई दर्द ही पाता है ।

आ जाओ अब तो सनम दमें-आखिर आ चुका हमारा
* प्रेम * का तुम बिन अकेले दिल बहुत घबराता है ।


मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर )

Monday, January 4, 2021

नागा सेना का 120 वर्ष पुराना दृश्य।



ढूंढाड़ क्षेत्र (जयपुर) को लगातार 200 साल व 33 युद्धों में भाग लेकर त्यागमयी सेवा और कुर्बानी देने वाली - नागा सेना का 120 वर्ष पुराना दृश्य। 

नागा सेना ने वर्ष 1779 में बादशाह शाहआलम द्वितीय के सेनापति मुर्तजा खां भड़ेच को उसके हाथी सहित मार दिया था। जिसमे बादशाह के लगभग 50 हजार सैनिक खाटू श्याम के मंदिर पर हमला करने आए थे। 

प्रमाणिक तथ्य को इस युद्ध में दादू संत मंगलदास महाराज जी सिर कटने के बाद भी झुंझार बन लड़ते रहे।

राजपुताने का इतिहास ऐसे वीरों के उल्लेख के बिना अधूरा हैं।

Sunday, January 3, 2021

कोई तो समझें किसान की व्यथा-प्रेम बजाज




सुबह के 4 बजे का समय है सुखिया अपने खेतो पर जा रहा है फ़सल को पानी देने और रास्ते में देखता है काशी राम जिनका खेत रास्ते में आता है, वो मेढ पर पानी रोकने के लिए अपने बेटे को बैठाया हुआ है, और बच्चा ठंड में पानी में बैठा कांप रहा है।
" काशी भाई राम- राम "
" अरे राम- राम सुखिया, खेत पर था रहे हो?"
" हां भई, इस समय तो खेत पे ही जाना है, अर्रेएएएएएए ये क्या, मेढ पर छोरे को क्यों बैठा रखा ? उसे बिमार करेगा क्या?"
" भई पानी नहीं रूक रहा था, कल भी मिट्टी चढ़ा के गया था, देख फिर उतर गई, अब होर तो कोई चारा ना है"
" अरे तो छोरे को मारेगा क्या? मासूम जान, और उपर से इतने कड़ाके की ठंडी, जो छोरे को कुछ हो गया तो क्या करेगा"?
" होर कोई चारा भी तो नहीं ना,
" भाई मेढ पक्की क्यों नहीं बनवा लेते ?"
" अरे सुखिया किस-किस चीज़ के लिए उधारी लूं, और फिर चुकाना भी तो है, कहां से चुकाऊंगा साहुकार का पहले ही इतना कर्जा है सिर पर" !
" हां भाई ये तो है , पिछली फसल का पूरा पैसा मिल जाये तो कुछ काम भी ठीक से हो जाए, कहां से लाएं, घर का खर्च करें या खेत का, आधा तो जमींदार खा जाता है, उसके बाद आढ़ती ले लेता है, सरकार तक फसल पहुंचते-पहुंचते आधी कीमत तो रास्ते में ही खत्म हो जाती है, बाकी जो आधी पल्ले पड़ती है, उसमें से तो खेत का खर्चा ही मुश्किल से निकलता है, और कभी राम जी की मर्जी ना हो तो फसल भी ढंग से नहीं होती, कभी तो राम जी बारिश ही नहीं करते सुखा पड़ने से फसल नहीं होती और कभी बिन बादल बरसात हो जाए तो खेतों में बाढ़ सी आ जाती है, तो भी फसल खत्म ।
" हां काशी भाई हम किसानों के तो कर्म ही खोटे है, हम अपनी धरती मां का सीना चीर कर नए-नए अंकुर निकालते हैं, जेठ की तपती दोपहरी में जब लोग कूलर, ए.सी. में सोए होते हैं, हम खेतों में काम करते हैं, पूस की ठिठुरती सर्दी में जब लोग बंद कमरों में कम्बलों में दुबके होते हैं, हम आधी- आधी रात को खेतों में पानी के बीच खड़े हो काम करते हैं, इतनी मेहनत-मश्शकत के बाद भी साहुकार के हमेशा कर्जदार ही रहते हैं , अगर सरकार एक मुल्य नियत कर दे तो कोई भी हमें धोखे में नहीं रख सकता और ना ही कोई बिचोलिया हमारी मेहनत की कमाई खा सकता है, पर कौन सुने हम किसानों की व्यथा!"
" लेकिन सुखिया ऐसे कब तक चलेगा, ना तो हम अपने बच्चों को बड़े स्कूल में पढ़ा सकते हैं, ना ही हम सुख- चैन की जिंदगी जी सकते हैं, सब को रोटी देने वाले को भी कभी-कभी भूखा सोना पड़ता है, कुछ ना कुछ तो इसका हल निकालना ही होगा ना, वरना तो आने वाली नस्लें तो खेती और किसानी के नाम से दूर रहेंगी, कोई भी किसानी करना नहीं चाहेगा"!
" काशी भाई कह तो आप सही रहे हो, इश्वर की कृपा से मेरे बुजुर्गो की बहुत जमीन जायदाद थी तो मैंने अपने छोटे भाई को अचछा पढ़ा दिया, नहीं तो इस कमाई में तो रोटी भी मुश्किल है, मैंने तो छोटे से कह दिया कि पढ़ाई खत्म करते ही, गांव में खेती करनी है, बस काशी भाई थोड़ा इंतजार और मेरे भाई ने अर्जी लगा दी है , जल्दी ही वो सरकार से बात करेगा और हमारा धान सीधा सरकार के पास पहुंचेगा और हमें सही दाम मिलेगा, और उसकी पढ़ाई भी मैंने कृषि की कराई है, जिससे वो हमें ऐसे नए-नए तरीके बताएगा खेती के जिससे फसल भी अच्छी हो"!
" हां सुखिया अब तो तेरे भाई का ही इंतजार है, शायद उसके प्रयास से ही कोई समझे हम लोगों की व्यथा, कोई तो निकाले उसका हल"!

मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर )

Monday, December 28, 2020

उपर वाला कमरा- प्रेम बजाज




राजेश महरोत्रा एक नामी कपड़े के व्यापारी , मुम्बई में अच्छा बड़ा कपड़ों का शोरूम , इकलोता बेटा है साहिल , इसलिए उसकी हर ख्वाहिश पुरी की जाती ।
वो कुछ समय अमेरिका रहना चाहता है , इसलिए राजेश महरोत्रा उसे अमेरिका भेज देते हैं , यहां का बिजनेस राजेश जी देखते हैं , नौकरी की फौज तो है ही साथ में , बस इश्वर की कृपा से सब बहुत बढ़िया चल रहा है ।
आज लगभग एक साल होने को आया , राजेश जी बहुत परेशान हैं ।
कारण ..... उनके घर में एक लड़की राधा लगभग 18 --- 19 साल की काम करती थी , दिन-रात यही राजेश जी के घर पर ही रहती थी , बहुत नेक , मेहनती और अच्छी लड़की थी ।
ना जाने क्या हुआ एक दिन उसने आत्महत्या कर ली । तब से राजेश जी बहुत परेशान हैं कि राधा ने आत्महत्या क्यों की ।
जिस समय सुबह-सुबह आ के राजेश जी की बीवी रश्मि ने आकर बताया कि राधा ने आत्महत्या कर ली , राजेश जी हड़बड़ा कर उठे और सबसे पहले उन्होंने पुलिस को फोन किया , और थोड़ी ही देर में पुलिस आ गई और तहकीकात शुरू हो गई , लेकिन अभी तक राधा की आत्महत्या का मामला सुलझा नहीं ।
राजेश महरोत्रा का आलीशान घर , तीन बैडरूम वाला , उपर दो कमरे बने हैं , पीछे बैकयार्ड में सर्वेंट क्वार्टर हैं । एक क्वाटर में एक परिवार रहता है ।
राधा के माता-पिता कहीं दूर गांव में रहते हैं , वो राजेश जी के घर पर रहती है इसलिए अकेली होने की वजह से उसे क्वाटर में नहीं रखा गया , उसे रहने को उपर वाला कमरा दे दिया गया ।
रोज़ सुबह-सुबह 6 बजे राधा आकर रश्मि को चाय देती थी , लेकिन उस दिन सूरज सर पर चढ़ आया सात बज गए चाय नहीं आई , तो रश्मि ने राधा को आवाज़ लगाई , लेकिन कोई उत्तर ना पाकर रश्मि उपर उसे देखने चली गई कि आज तक ऐसा नहीं हुआ , कि राधा इतनी देर तक सोती रहे , शायद तबीयत ख़राब हो ।
जाकर दरवाजा खटखटाने लगी तो देखा दरवाजा खुला था और राधा बिस्तर पर बेसुध पड़ी थी , बहुत बुलाने पर ,हिलाने - डुलाने पर जब राधा ने कोई प्रतिक्रिया नही की तो रश्मि  का दिल धक-धक करने लगा , एक अनजानी शंका ने घेर लिया , और वो जल्दी से नीचे आई और महरोत्रा जी को जगाया और राधा के बारे में बताया ।
महरोत्रा जी ने उसी पल पुलिस को फोन कर के बुला लिया , पुलिस आई और लाश को पोस्टमार्टम के लिए लेजाया गया , लेकिन आज एक साल से  राधा का केस ज्यूं का त्यूं है कोई नतीजा नहीं निकल पा रहा , राधा के मां- बाबा रोज़ शहर आ- आ कर थाने के चक्कर काट कर थक गए ,लेकिन कुछ पता नहीं चल रहा कि राधा ने आत्महत्या क्यों की ।
दो साल पहले राधा को उसके मामा गांव से लाए थे जो राजेश जी के शोरूम में काम करते थे , बोले .... साहब किसी काम पे रख लो , चार पैसे भी कमा लेगी , कुछ ढंग के तौर-तरीके भी सीख लेगी । तो राजेश जी ने बीवी से सलाह  मशवरा करके उसे घर पर रख लिया । घर में वैसे तो दो - तीन  नौकर  थे ही , मगर ये भी घर का काम अच्छे से देख लेती थी , इसके आने से रश्मि को बहुत आराम मिला था , रश्मि का लगभग सारा काम राधा सम्भाल लेती थी ।
सुबह-सुबह रश्मि को चाय देना , फिर नाश्ते में मदद कराना , इस तरह से रश्मि को काफी सहारा मिल जाता था । अब रश्मि को आने - जाने की भी परेशानी नहीं रही , वो जानती थी उसके घर ना होने पर रश्मि सब संभाल लेगी ‌।
लेकिन इस समय रश्मि का भी चिंता से बुरा हाल था , उसे समझ नहीं आ रहा कि राधा की आत्महत्या का कारण क्या है ,  वो राजेश से रोज़ पुलिस से बात करने को कहती कि पुलिस किसी नतीजे पर क्यों नहीं पहुंच रही कि ये हत्या है या आत्महत्या , और क्यूं और कैसे ? 
राजेश का बेटा साहिल  भी अमेरिका से अब वापिस आ गया ,उस की शादी की चर्चा चल रही है , घर में अब राधा की जगह दूसरी नौकरानी  शीतल  रखी गई है , राधा वाला कमरा उसे दिया गया  । 
साहिल  की शादी तय हो गई , और  धुमधाम से शादी हुई । साहिल हनीमून से लौट कर अपने पापा राजेश जी का बिजनेस संभाल लेता है , घर में दो सदस्य आने से घर की रौनक बढ़ गई है लेकिन रश्मि को चैन नहीं , रह - रह कर उसे राधा का ख्याल आता है , और एक दिन वो खुद पुलिस के पास जाती है , राधा के केस के बारे में जानने के लिए ।
 " इंस्पेक्टर , क्या अभी तक राधा के बारे में किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे आप लोग , आखिर हुआ क्या था ? हत्या या आत्महत्या ? और क्यूं और कैसे हुआ ये सब ? 
" मिसेज महरोत्रा आप  बेवजह परेशान हो रही है , जब कुछ सुराग ही नहीं मिला तो हम क्या कर सकते हैं ।
निराश हो कर रश्मि घर वापिस आ जाती है ।
और एक दिन  सुबह शीतल पुलिस को फोन कर के बुलाती है ,और पुलिस  को राजेश जी को अरेस्ट करने को कहती हैं ।
मिसेज महरोत्रा.... शीतल ये सब क्या है , तुम्हारी इतनी हिम्मत कि तुम अपने देवता जैसे मालिक को अरेस्ट करने के लिए कह रही है । "
इंस्पेक्टर भी शीतल से ....  तुम इस घर की नौकरानी हो और अपनी औकात में रहो , मालिक के बारे में बोलने से पहले कुछ तो सोचा होता ।
माफ़ किजिए महरोत्रा साहब इसने हमें झूठ  से कह दिया कि आप ने बुलाया है , राधा के बारे में कुछ बात करनी है , हम आप का फोन भी ट्राई कर रहे थे , लेकिन आप कि फोन भी नहीं लग रहा था , इसलिए हम चले आए , शीतल जाओ और अपना काम करो ।
राजेश महरोत्रा अवाक् से ये सब देख - सुन रहे हैं , उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा कि ये सब क्या हो रहा है ।
शीतल अपना आई. कार्ड दिखाती है  जिसे देख कर इंस्पेक्टर उसे सेल्यूट करता है , राजेश जी पूछते हैं कि ये सब क्या है , तब शीतल बताती है कि वो ही. आई. डी. इंस्पेक्टर है , और राधा केस की छानबीन करने आई है ।
इंस्पेक्टर... " लेकिन मैडम हमारे पास ऐसी कोई इंफॉर्मेशन नहीं थी । 
"" क्योंकि आप सब महरोत्रा जी के साथ हैं , हमें उपर से आर्डर था कि केस की छानबीन गुप्त तरीके से हो , और आप लोगों को किसी को भी कुछ नहीं बताना । 
"" तो मैडम क़ातिल कौन है ?
" राजेश महरोत्रा 
इंस्पेक्टर और राजेश महरोत्रा दोनों अवाक से इंस्पेक्टर शीतल को देखते  हैं ।
शीतल सारी कहानी बताती है ... कि राधा इनके घर पर अच्छे से काम कर रही थी , रश्मि उसे बेटी जैसे समझती थी , इसलिए कभी - कभी रश्मि को कहीं जाना होता तो राधा घर संभाल लेती थी , एक बार रश्मि का भाई बीमार था और रश्मि मिलने गई , उसे वहां तीन - चार दिन लग गए ।
पीछे से राधा और राजेश जी अकेले थे , रात को जब आने के बाद राधा अपने कमरे में जाकर सो गई तो अचानक राजेश जी को याद आया कि कल उन्हे किसी काम से सुबह जल्दी जाना है तो वो राधा को ये कहने उसके कमरे में गए कि सुबह जल्दी उठ कर नाश्ता बना दे , लेकिन जब वो कमरे में गए तो राधा गहरी नींद में थी और उसे इस तरह से सोया देख राजेश के अन्दर भी काम अंगड़ाई लेने लगा , और वो राधा के करीब लेट गया और उसे बाहों में भर लिया , मजबूत पकड़ में आने के कारण राधा की नींद टूटी , पहले तो उसने खुद को छुड़ाने की कोशिश की , मगर चढ़ती जवानी वो भी बहक गई और आत्मसमर्पण कर दिया , और दोनों बह गए काम के वेग में , दोनों को लत लग गई एक दूसरे की , जब भी मौका देखते काम पिपासा बुझा लेते , राधा के अन्दर एक जीव  सांसे लेने लगा था ,  राजेश ने वादा किया था कि रश्मि को तलाक देकर ,उसे घर , पैसा , प्यार, सब देगा वो  चहकने लगी थी और इसी चहक में वो एक गलती कर गई  , पड़ोस की बाईं मीरा से उसकी अच्छी दोस्ती थी , और वो बातों- बातों में उसे बता गई ।
और एक दिन  रश्मि मार्केट गई थी तो राधा ने राजेश को घर बुलाया और कुछ पेपर साइन करने को कहा , जिसमें उसकी प्रोपर्टी की आधी की उसका आने वाला बच्चा मालिक  होगा , राजेश जी ने उसे कहा कल वो अपने वकील को बुला कर कोई ना कोई फैसला कर देंगे । मामला आर या पार कर देंगे , राधा बहुत खुश थी उस दिन, उसने मीरा को भी बताया ।
और रात को राजेश जी ने उसका गला घोंट कर मार डाला , किसी को कानों-कान खबर नहीं हुई ।
लेकिन मीरा ने अपनी मालकिन को सब बताया तो उन लोगों को शक हो गया और उन्होंने अपना शक ज़ाहिर किया , और पुलिस चोकन्नी हो गई , मैं सी. आई. डी. इंस्पेक्टर आपके घर में नोकरानी बन कर आई ताकि मैं घर में रह कर जानकारी हासिल कर सकूं , उपर वाले कमरे में से एक फोटो के पीछे मुझे एक डायरी मिली , जो राधा कभी कभी लिखती थी , उस दिन भी उसने उस डायरी में सब कुछ लिखा था , जिसमें उसने यह भी लिखा है कि आप कल मैडम को तलाक देकर  उसे ओर उसके होने वाले बच्चे को जो आपके प्यार की निशानी है अपना लोगे । और उसी रात उसकी मौत , रिपोर्ट भी अपने गायब करवा दी , जो कि हमने डाक्टर से निकलवा ली है , जिसमें साफ ज़ाहिर है कि राधा प्रेगनेंट थी और उसका गला घोंट कर मारा गया , सारे सबूत राजेश जी के ख़िलाफ़ थे , अब उनकी पैसा खाई पुलिस भी कुछ नहीं कर सकती उन्हें राजेश जी को अरेस्ट करना ही था ।


मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर )

ठिठुरते पाले में थोड़ा चैन तो दिलाओ-प्रेम बजाज




शीतल बयार बहती है, ठिठुरन बढ़ती जाती है,
सुरज छिप कर बैठ गया, पूस के ठंडे दिनों में,
पानी भी बर्फ सा जमता जाता है, बादल जैसे
घूम रहा धरती पर, कोहरा ऐसा छाया है, बदन
कांपता सर्द हवाओं से, हाथ-पांव भी लगे हैं
ठिठुरने पाले से, करते विनती सूर्य देव से, आ कर
दर्श दिखाओ ना, अपनी तेज किरणों से हमको थोड़ा
तपाओ ना, इस ठिठुरते पाले में थोड़ा चैन तो दिलाओ ना।
छोड़ रजाई तनिक हम भी देखे बाहर की ओर, लेकर हाथ
में गर्मागर्म चाय का प्याला,थोड़ी सेंकने धूप , रहम करो
ज़रा तुम उन पर पड़े जो किनारे सड़क के,ना कोई गद्दा,
ना रजाई पास उनके, ठंड में ठिठुरती हडि्डया उनकी,
पाले से किटकिटा रहे दांत हैं, डालो तपती किरणें उन पर,
ठंड से जो हो बेहाल रहे ।


मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर )

हम लिखते वो अफसाना लोग-प्रेम बजाज



कहते सुना है लोगों को हम लिखते हैं,
रो दे पड़ने वाला वो अफसाना लिखते हैं।

बर्बाद होना पड़ता है प्यार में हमेशा,
वरना आसानी से रिश्ते कहां निभते हैं।

प्यार में यार के इस क़दर डूबे हैं हम,
खड़े उसके लिए सरे बाज़ार बिकते हैं।

रोते हैं चुपके-चुपके याद में उसकी हम,
मगर सारे जहां को हंसते हुए दिखते हैं।

कहने को तो सोते हैं मखमल के गद्दे पर,
जुदाई में यार की अंगारों पर सिकते हैं।

ढुंढते फिर रहे हैं उन्हें कुल जहां में हम,
इसलिए एक जगह कहां हम टिकते हैं।

पढ़ोगे "प्रेम" को तो रो दोगे तुम भी
वो दर्दे-दिल, ज़ख़्म-ए-जिगर लिखते हैं।


मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर )

Monday, December 21, 2020

21वीं सदी की बुलबुल-प्रेम बजाज




हैलो .......""शीतल बिटिया कहां हो, कब तक पहुंचोगी , कब से राह तक रहे हैं ?
""बस मां दस मिनट में पहुंच जाएंगे , अभी - अभी बस से उतरे हैं बस रिक्शा किया और सीधा आप लोगों के पास ।
दस - पंद्रह मिनट बाद शीतल अपने मायके पहुंची जाती है , मां - पापा ,भाई - भाभी , बच्चों से सबसे मिलती है  उसका बेटा सौरभ भी सबसे मिलता है ।  
""अरे बुलबुल दिखाई नहीं दी वो कहां है ,बाहर है क्या ??
""नहीं, बुलबुल घर पर ही है, उसे नहीं लाई।
""कितनी बार कहा है उसे यूं अकेला ना छोड़कर आया कर लेकिन तु है कि सुनती ही नहीं । 
""अरे मां  बुलबुल अकेली कहां है दादा - दादी  , चाचा , बुलबुल के पापा सभी तो हैं , और छोटी बुआ भी तो शहर में ही रहती है वो भी अक्सर आ जाया करती है ।  और वो गौरव जो मेरी बड़ी ( जीजी ) ननद का बेटा वो तो बहुत ख़्याल रखता है बुलबुल का ।   
""हे भगवान् ना जाने कब समझेगी ये लड़की, आज के वक्त में अपने जाए पर तो भरोसा नहीं और तु चली औरों पे भरोसा करने । 
""ओफ्फो मां , अब छोड़ो भी, कुछ नाश्ता - वाश्ता कराओ भूख लगी है ।
प्रेम ( शीतल की मां ) नाश्ता बना रही है और खो जाती अपने जीवन के उन दिनों में जो नासूर बन कर उसे हर पल कटोचते हैं ।  उसकी बुआ का लड़का ( गोविंद ) भी तो उन्हीं के घर में रहता था , बहुत भरोसा था सभी को उस पर तभी तो कहीं भी जाना हो  गोविंद के साथ उसे भेज देते थे , खुद कहीं जाना है तो घर पर गोविंद के  सहारे छोड़ कर निश्चिंत हो जाते थे , कहते थे गोविंद भाई है ना तेरे साथ , वो तेरा अच्छे से ध्यान रखेगा ‌ , लेकिन कोई नहीं जानता था कि कैसा ध्यान रखता था वो घर पे अकेले होते जब,   कभी उसके शरीर पर हाथ फिराता , कभी उसकी छाती को चुमता , कभी उसके गुप्तांग को हाथों से सहलाता और साथ में कहता   ""मां को मत बताना वरना मां तुम्हें ही  डांटेगी , उससे बात करते हुए गंदे- गंदे शब्दों का इस्तेमाल करता , फिर कहता ये शब्द कितने अच्छे हैं ना पर मां को मत बताना  , हर बात नहीं बताया करते , और वो चुप रह जाती ।
""मां आप भी आओ ना सब मिलकर नाश्ता करते हैं  ।
"" अं ..... हां हां आई ........आई ‌।
सभी नाश्ता करते हैं मिल बैठ कर लेकिन प्रेम का मन कहीं और भटक रहा है । जल्दी से सारा काम निपटा कर  शीतल और प्रेम दोनों मां - बेटी आ बैठती है कमरे में , सौरभ मामा - मामी  से बातें कर रहा है और शीतल मां से ।
""मां कहां खो जाती हो , क्या हो जाता है आपको बुलबुल की इतनी चिंता क्यों करती हो , वो अब छोटी बच्ची नहीं है ‌।
"" शीतल, बेटा तुम बहुत भोली है, इस तरह लड़की जात को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए,  मुझे पता है अब तुम कहेगी सब तो हैं उसके पास,  मैं जानती हूं सब हैं , लेकिन तु तो नहीं ना ।
"" मां आप बेकार में चिंता करती हो, बुलबुल भी आप ही की तरह स्ट्रांग है , तभी तो आपके बचपन का नाम बुलबुल मैंने उसका नाम रखा ।
"" तुझसे कितनी बार कहा मेरे बचपन की कोई बात ना किया करो ।
"" क्यों मां , आप हमेशा ऐसे कह के मुझे चुप करा देते हो, आज आप को बताना होगा कि आखिर क्या ऐसा दु:ख  है जो आपको अन्दर ही अन्दर साल रहा है ।
प्रेम शीतल को अपने बीते कल की सारी घटनाएं बताती है ।
"" तुमने अपनी बेटी का नाम बुलबुल इसलिए रखा कि मुझे बचपन में बुलबुल बुलाते थे सब , तु कहती हैं ना कि मां मैं भी अपनी बेटी को इस बुलबुल जैसा स्ट्रांग बनाऊंगी ।
तो सुन ये बुलबुल बचपन में इतनी स्ट्रांग नहीं थी जितनी अब हो गई है। ज़माने ने इसे पत्थर बना दिया है ।
मेरी बुआ का लड़का हमारे ही घर रहता था , और उसके बारे में सब कुछ बताया शीतल को कि वो प्रेम के साथ कैसे और क्या किया करता था , उसके बाद चाचा की शादी थी , उसने भी हाथ आजमाने के लिए उसे ही चुना उस पर अपने तरीके अपनाता कि वो अपनी बीवी के साथ  गृहस्थ कैसे रहेगा। तब भी उसे किसी से कुछ ना बताने को मजबूर किया गया।
छोटे मामा नानी के कहने से बाहर थे उन्हें समझाने के लिए हमारे यहां पिताजी के पास भेजा गया, मामा ने भी जब - जब अकेली देखा, कभी होंठों का रस पिया तो कभी जिस्म पे हाथ फेरा।
जो भी रिश्तेदार आता हर कोई किसी ना किसी बहाने प्यार से और कोई नज़रों से बदन को छू जाता ।
"" हे भगवान्  मां आप ने इतना सहा, विरोध क्यूं नहीं किया किसी का ?
"" बेटी , विरोध करना औरत के नसीब में इश्वर लिखना भूल गया था।
विरोध करती , आवाज़ उठाती भी तो किसके खिलाफ , सभी पीड़ा देने वाले  अपने सगे ही तो थे , किसकी शिकायत किससे करती ।
इसलिए मुझे इस बुलबुल नाम से ही भय लगता है, जो मेरे साथ बीता वो तेरे साथ ना हो, इसलिए मैं एक पल के लिए भी कभी तुझे अकेला नहीं छोडती थी , कहीं भी जाती थी , तुझे हमेशा साथ लेकर जाती, कि कहीं ऐसा ना हो , फिर से वही पीड़ा सामने आए । इसलिए तुझे हर बार यही कहती हूं बुलबुल को अकेला मत छोड।
"" नहीं मां मैं बुलबुल के साथ ऐसा नहीं होने दूंगी। मैंने बुलबुल को सब समझाया हुआ है , हमारी बुलबुल गुड टच, बैड टच , अच्छा क्या , बुरा क्या , किस की हरकत किस हद तक बर्दाश्त करनी है, किसे पलट कर कैसे और कब, कहां वार करना है , ये सब जानती है , और आजकल तो स्कूलो में भी बच्चों को ऐसे विषयों पर जानकारी दी जाती है।
मां ये आज की बुलबुल है , 21 स्वीं सदी की बुलबुल, जो ना जुल्म सहेगी और ना किसी को  सहने देगी ।
इंट का जवाब पत्थर से देगी , वहशी दरिंदों को सबक सिखाएगी।
         ये 21सवी सदी की बुलबुल है । 



मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर)

उत्सव एक अलग की कला-प्रेम बजाज




आज की कविताओं में विनोद का ज़माना है , लेखक परोसे, पाठक पढ़ें, श्रोता बनता विनोद का  सारा जमाना है । अब ना सच्चा विनोद है साहित्य में, ना सच्चा विरोध रहा, कहीं साहित्य बिक रहा, कहीं साहित्यकार बिक रहा।
छींटाकशी और विनोद की कविताओं में ना कोई सीमा - रेखा है  ।   जहां मिले माया वहां साहित्यकार खूब विनोद, छींटाकशी उड़ेलता है,  कहीं साहित्यकार से ही खुद अपना साहित्य बेचने को मजबूर किया जाता है। किए जाते हैं साहित्यिक उत्सव , कलमकारों का उत्साह वर्धन होता है, 
जैसे त्योहारों के उत्सव में बच्चों का लगता तांता है ।
अमीर मनाए उत्सव  तो विनोद का समां बंध जाता है , रहती ना कोई सीमा- रेखा विनोद की  सब दुःख दूर भाग जाता है ।
ग़रीब मनाए कैसे उत्सव कोई उसकी तो तनख्वाह भी तो बेमानी है , कहीं फीस बच्चों की है भरनी, कहीं अन्य भत्तों का भी पलड़ा भारी है ।
दूध, किराया, राशन और बचा खुचा मरहम पट्टी और दवा का बिल उससे भरा जाता है ।
आज के समय में मनाना हो उत्सव  तो सीखो आज के तेवर तुम , तनख्वाह के साथ- साथ ऊपर का पैसा कमाना पड़ता है ।


मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर )

Sunday, December 20, 2020

हम जो उतरे सागर में साहिल पे-प्रेम बजाज



हम जो उतरे सागर में साहिल पे खड़े लोग देखा किए ,
मौजों ने लगाया पार हमें साहिल ने फिर मझदार में ला खड़ा किया ।
ना -खुदा के ज़ुल्मों - सितम का करूं क्या मैं बयां ,
सितम तो मुझ पर अपनों ने ही किये ।
माना कि हम दो किनारे हैं दरिया के मिलना मुमकिन नहीं
चलते हैं साथ ये भी तो कम नहीं ।

रहते हो ख़्वाबगाह में भी किनारे की तरह ,
एक किनारा खामोश और एक सिसका किए ।
फ़ना हो कर इश्क में तुम्हारे तड़फते रहते हैं रात भर
यूं ही तेरी आंखों के समुन्दर में डूब जाने के लिए ।
सारा जहां बेशक कर ले किनारा तुझसे मेरा साथ ना छुटेगा
दो किनारों सा है प्यार हमारा संग रहा , संग रहेगा ।

लहर नहीं मैं कश्ती हूं प्यार के समुन्दर की, लहर तो आकर लौट जाती है ,
कश्ती किनारे का साथ सदा रहता है ।
नहीं होश कोई हम दोनों को ,इस प्यार की उफ़नती नदी का
पानी मदहोश किए जाता है छु कर तुझे , मुझे आ छुता है ।
हम दो किनारे मिलकर बिछड़ने के लिए , बिछड़ कर मिलने के लिए ,
ये लहरें कुछ तुमसे ले आती हैं , कुछ मुझको दे जाती हैं ,
यही तो हमारा प्रेम है , दो किनारों का अमर प्रेम ।


मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर )

Monday, December 14, 2020

संघर्षों के साथ जीवन यापन की कला-अनुराग ठाकुर

संघर्षों के साथ जीवन यापन की कला


जीवन संघर्ष का दूसरा नाम है ,हाँ जी संघर्ष ही जीवन है ।संघर्ष! यह एक ऐसा अनुभव है जिससे शायद ही दुनिया का कोई व्यक्ति वंचित रहा होगा। हम सब को बचपन से ही सिखाया जाता हैं कुछ भी पाने के लिए संघर्ष करना ही पड़ता है। बिना संघर्ष कभी कुछ हासिल नहीं कर सकते समाज में प्रतिष्ठा, नाम-शोहरत, रुपया-पैसा, तरक्की या फिर पढ़ाई में अव्वल होना हो, चाहे जो भी लक्ष्य हो उसे प्राप्त करना बिना संघर्ष के संभव नहीं।
इसमें कोई दोराह नहीं की संघर्ष जीवन को तराशता है, निखारता है, सँवारता है और फिर हमें ऐसे साँचे में गढ़ता है जिसकी प्रसंशा दुनिया करते हुए नहीं थकती। शायद यही वो मुकाम या मंजिल होती है जिसके लिए मनुष्य भरशक प्रयास करने से पीछे नही हटता है जिसे हम संघर्ष कहते हैं। इसके पश्चात जो सफलता प्राप्त होती है निसंदेह वो अतुलनीय होती हैं। संघर्ष ही है सफलता की कुंजी है । संघर्ष जीवन के उतार-चढ़ाव का अनुभव कराता है, अच्छे-बुरे का ज्ञान करवाता हैं, सतत सक्रिय रहना सिखाता है, समय की कीमत सिखाता है जिससे प्रेरित होकर हम सशक्तिकरण के साथ फिर से अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित होते है और जीवन जीने के सही तरीके को सीखते हैं। दुनिया का हर व्यक्ति जीवन में सफलता की उम्मीद करता हैं जिसके लिए वो अथक प्रयास भी करता है। कई बार कुछ अलग करने की चाह और प्रबल प्रेरणा से व्यक्ति अपने मुकाम के करीब पहुँच भी जाता है लेकिन कुछ कठिन संघर्ष को सामने देख सफलता से वंचित हो जाता है।
और वह नहीं जान पाते की उनके साथ ऐसा क्यों हुआ ,जिस कारण उनके सपने अधूरे के अधूरे रह जाते है और जीवन के अंतिम पलों तक उनकी इच्छाएँ आधी-अधूरी रह जाती है। ऐसी इच्छाएँ उन्हें अपने जीवन से निराश के मोड़ पर लाकर के खड़ी कर देती है क्योंकि अधिकांश लोग अपने संपूर्ण जीवन में यह जान ही नहीं पाते की सफलता कैसे हासिल करें । जीवन ‘संघर्ष’ का दूसरा नाम हैं। एक बात हमेशा याद रखिए, अपनी मंजिल का आधा रास्ता तय करने के बाद पीछे ना देखे बल्कि पूरे जुनून और विश्वास के साथ बाकी की आधी दूरी तय करे, बीच रास्ते से लौटने का कोई फायदा नहीं क्योंकि लौटने पर आपको उतनी ही दूरी तय करनी पड़ेगी जितनी दूरी तय करने पर आप लक्ष्य तक पहुँच सकते है। आगे बढ़कर भी अगर सफलता ना मिल पाई तो भी कोई बात नहीं कम से कम अनुभव तो नया होगा। बार-बार हार के भी हिम्मत के साथ अपने टारगेट की तरफ कदम बढ़ाना ही संघर्ष है। अपनी हर असफलता से कुछ सीखिए और निडरता के साथ संघर्ष का दामन थाम के मंजिल की ओर आगे बढ़िए।
जब तक जीवन में संघर्ष नहीं होता तब तक जीवन जीने के अंदाज को, सच्ची खुशी को, आनंद को, सफलता को अनुभव भी नहीं कर सकते। जिस तरह बिना चोट के पत्थर भी भगवान नहीं होता। ठीक उसी तरह मनुष्य का जीवन भी संघर्ष की तपिश के बिना ना तो निखर सकता है, ना शिखर तक पहुँच सकता है और ना ही मनोवांछित सफलता प्राप्त कर सकता है। क्योंकि ”संघर्ष हमारे जीवन का सबसे बड़ा वरदान है और वो हमें सहनशील, संवेदनशील और देवतुल्य बनाता हैं।” जीवन में संघर्ष करते वक्त एक बात का सदैव ध्यान रखें कि लोग आपकी प्रशंसा कर रहे या बुराई क्योंकि ये दुनिया की रीति है यदि आप अपने मन से कुछ अच्छा करने की विचारधारा को लेकर प्रयास करने को लेकर कदम को बढ़ाया यदि आपको उसमें सफलता मिल गई तो आपकी प्रशंसा के अंबार लग जायेंगे वहीं यदि आप किसी कारण वश अपने मुकाम तक नही पहुँच सके तो आपको बुराइयों के साथ साथ ताने सुनने से कोई नही रोक सकता है तो आपको इतना याद रखना है कि आपको उनकी नकारात्मक सोच को पीछे छोड़ अपने तक पहुँचने में फिर से अथक प्रयासों में लग जाना है संघर्ष के इस सूत्र को समझिए और उसपर चलने की कोशिश कीजिए। यकीन मानिए आप जीवन को एक अलग रूप से देखने लगेंगे।

अनुराग ठाकुर (पत्रकार)
                           औरैया-उत्तर प्रदेश

Saturday, December 5, 2020

छोड़ दो अब तो बहुत हुआ-प्रेम बजाज


 


मत जकड़ो मुझे इस तरह ,छोड़ दो अब तो बहुत हुआ 
ना सताओ मुझे बक्श दो अब तुम्हारा ज़ुल्म बहुत हुआ ।

मैं  वो इन्सान हूं जिसने नहीं सताया  कभी किसी  बेजुबान को ,
नहीं कभी प्रकृति को कोई कष्ट पहुंचाया मैंने, तो क्यों  दी 
जा रही मुझे सज़ा ।

मैंने तो कोई बिमारी नहीं फैलाई , किसी मासूम का कत्ल 
नहीं किया , नहीं किसी अबला पर ज़ुल्म किया ,ना ही किसी की 
आबरू  का कत्ल किया, नहीं किसी के मुंह से छीना निवाला ।

फिर मुझे  क्यों दी जा रही है सज़ा , क्यों मुझ पे ये  आपदा आई 
क्यों मुझ पर डा रहे हो कहर, क्यों बना कठपुतली नचा रहे हो मुझे 
बस करो छोड़ दो अब तुम्हें खुदा का वास्ता , अब बहुत हुआ ।

हे ईश्वर अब तो मुझ पर करो रहम , मुझे निकालो इस मकड़ी जाल
से , बस अब बहुत हुआ ।


मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर)

Thursday, December 3, 2020

एक लड़की पहेली सी -प्रेम बजाज




मै जब भी आफिस जाता , अक्सर बस स्टैंड पर एक लड़की मुझे नज़र आती , जैसे ही बस आकर रूकती, हम सब में बस पे पहले चढ़ने की होड़ सी लग जाती , लेकिन वो इत्मीनान से खड़ी रह कर पहले औरों के चढ़ने देती और फिर खुद चढ़ती, और अगर बस मे जगह ना हो तो वो नीचे ही खड़ी रह जाती , अगर चढ़ जाती तो कोई बुज़ुर्ग या बच्चा होता तो बैठने के लिए पहले उसे सीट देती ।

अक्सर मैं देखता बस मे अगर किसी का बच्चा परेशान करता या रोता तो ना जाने क्या जादू था कि वो उसे गोद में लेकर झट से चुप भी करा देती और बैग से निकाल कर उसे चाकलेट भी देती ।मै बस उसे देखता ही रहता , कई बार मन चाहा कि उससे बात करू, मै दिल ही दिल मे उसे चाहने लगा था । लेकिन अचानक कुछ दिनों से वो नज़र नहीं आई, आँखे रोज़ उसे उसी बस स्टैंड पर ढुँढती ,पर पुछु तो किससे , कोई भी कुछ भी नहीं जानता था उसके बारे में ।

एक दिन मैं दोस्तो के साथ किसी होटल मे खाना खाने गया तो अचानक मेरी नज़र सामने के टेबल पर पड़ी वही लड़की लाल सुर्ख जोड़े में गहनों से लदी थी , और उसके साथ एक अधेड़ उम्र का शक्स , दिखने मे कुछ अजीब सा भी था ,हाव-भाव से लग रहा था कि पति-पत्नि हैं , लेकिन लड़की के हाव-भाव से पता चल रहा था कि वो खुश नहीं है । मैने सोचा एक बार मिला जाए लेकिन इतने मे वो उठ कर चले गए और वो लड़की मेरे दिल पर एक छाप छोड़ गई, जो हर समय हँसती रहती थी , वो आज खोई-खोई सी लग रही थी , ना जाने क्या थी उसकी कहानी, एक पहेली सी बन कर रह गई वो लड़की मेरे लिए ।



मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर )

Monday, November 30, 2020

दिल की दुविधा-प्रेम बजाज




हरीश बजाज प्राइवेट दफ़्तर में क्लर्क बाबु की नौकरी , दो बेटे, बड़ा गौरव , छोटा सौरभ मन में चाह कि बच्चों को अपने जैसा क्लर्क नहीं बनाना , इसलिए ओवर टाइम भी करता था , पत्नी भी लोगों के कपड़े सिला करती थी , ताकि बच्चों को अच्छी तालीम दे सके ।
दोनों बेटे पढ़-लिखकर ऊंची पोस्ट पर बड़ी-बड़ी कम्पनियों में नौकरी करने लगे पिता ने रिटायर होने के बाद दोनों बेटों में सबकुछ बांट दिया ।

सुनो," सब कुछ मत बांटो बच्चों में कुछ तो अपने लिए रखो , कल को अपने बुढ़ापे के लिए"!
"तुम तो ऐसे ही चिंता करती हो बुढ़ापे के लिए बच्चे हैं ना हमें किस बात की चिंता"!
शुरू में दोनों बच्चों ने खूब प्यार दिखाया फिर पुश्तैनी घर भी जब बंट गया दोनों में , मां - बाप ने सोचा, चलो अब बच्चों के साथ ही रहा जाए , कभी एक के कभी दूसरे के पास। गौरव दिल्ली , सौरभ मुम्बई हरीश ने दोनों बेटों से बात की।
गौरव, "सौरभ क्या तुम दोनों को रख सकते हो ? मेरा तो मुश्किल है इतनी मंहगाई उस पर से बच्चों की भी अब बड़ी क्लासे हैं उनके भी तो खर्चे हैं"!
"तो भैया मेरा भी तो यही हाल है"!
" तो ऐसा करते हैं एक को तुम रखो एक को मैं"!
" हां ये ठीक रहेगा , ना आप पर ज्यादा बोझ पड़ेगा ना मुझ पर ‌ पापा को मैं रख लेता हूं आप मां को ले जाओ"!
लाचार मां - बाप दो हिस्सों में बंट गए, कुछ समय बाद हरीश की तबीयत बहुत बिगड़ गई, डाक्टर ने बताया कुछ पता नहीं कब तक हैं।
दोनों की इच्छा है कि अंतिम समय में तो साथ रहे, लेकिन दोनों को रखने के लिए कोई राज़ी नहीं।
"गौरव बेटा, तेरे पापा का कुछ पता नहीं कब क्या हो जाए, हम चाहते हैं अन्तिम समय में हम साथ रहे"!
"मां आप जानते हो दो का खर्च ना मैं उठा सकता हूं ना सौरभ और फोन पर तो रोज़ बात कर ही लेते हो। ज्यादा है तो आप मेरे फ़ोन से वीडियो काल कर लिया करो लो मैं अभी आपकी बात कराता हूं"!
फ़ोन पर दोनों विडियो काल पर बात कर रहे हैं ।
हरीश ... "आशा तुम्हें देख कर बहुत मन खुश हो गया, ऐसा लग रहा है जैसे हर एक - दुजे के पास हैं"!
"हम पास ही तो हैं दूर कहां है, ये तो सिर्फ राहों की दूरियां हैं दिलों की नहीं"!
"आशा तुम्हें याद है, कभी - कभी तुम एक गीत गुनगुनाया करती थी"!
" वो मैं कैसे भूल सकती हूं अब तो हर पल वहीं गीत गुनगुनाती हूं"
"आज फिर से वही गीत सुनने का मन है, मैं भी तुम्हारे साथ गाऊंगा"
दोनों गाने लगते हैं .......
##तेरे बिना ज़िंदगी से शिकवा तो नहीं , शिकवा नहीं , शिकवा नहीं , तेरे बिना ज़िंदगी भी लेकिन ज़िन्दगी तो नहीं ##
गाते -गाते हरीश ख़ामोश हो गए,  आगे तो गाईये भूल गए क्या,  गौरव के पापा बोलिए ना क्या हुआ, लेकिन वो तो खामोश हो गए सदा के लिए और इसके साथ ही आशा  की आत्मा भी विलिन हो गई परमात्मा में!
 यह देख गौरव रो रहा है, गौरव का बेटा साहिल .... ‌ पापा ……… "क्यों रो रहे हैं आप , अब तो कोई दूविधा ही नहीं रही कि दोनों को एक साथ कैसे रखें, लेकिन मेरे  दिल में एक दूविधा है, क्या दादू - दादी को वहां  भी अलग -अलग रखा जाएगा या वहां दोनों एक साथ रह सकते हैं ,साहिल की  आंखों में बहुत से सवाल नज़र आए गौरव को, लेकिन वो उसके  दिल की दूविधा को  मिटाने में असमर्थ था।


मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर)

Sunday, November 29, 2020

जब प्यार किसी से होता है-प्रेम बजाज

जब प्यार किसी से होता है


जब प्यार किसी से होता है , इक अजीब सा ख़ुमार होता है ।
मस्ती का आलम रहता है हर पल , दिल बेकरार होता है ।

होता है यार नकाब में फिर भी शौक़े - दीद रहती है हर पल
नज़रों से नज़रें मिलती हैं , आंखों में अश्क बेशुमार होता है ।

हर पल बेकरार रहती है ज़ुबां , करने को राज़ - ए- इश्क ब्यां
मगर इश्क वो बला है ज़ालिम कि ज़ुबां से ना इकरार होता है ।

सीने में होती है सरसराहट , हर पल महसूस होती है उनकी
आहट , झूमता है दिल नशे में ,जब इश्क बेशुमार होता है ।

सताती है *प्रेम * को हर पल यार की याद, तड़पती है रातों में
ना सुकुन मिलता है रातों में , ना दिन में ना करार होता है ।

मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर )

Thursday, November 26, 2020

फेसबुकिया प्यार ख़तरनाक-प्रेम बजाज



आक्षी को फेसबुक पे रोहित नाम के लड़के से प्यार हो गया ।
रोहित ग़ैर जात था, दोनों के माता-पिता नहीं मानेंगे, इसलिए रोहित के कहने पर आक्षी घर से भाग कर रोहित के पास पहुंच गई।
रोहित ने धोखा दिया, उससे शादी ना करके उसे कोठे पर बेच दिया। आक्षी ने कोठेवाली से मिन्नतें की कि उसे छोड़ दें , उसे इस दलदल में ना धकेले, लेकिन कोठेवाली ने उसकी एक ना सुनी, और उसे एक कमरे में बंद कर दिया, आक्षी खिड़की से भाग गई और ट्रेन की पटरी पर लेट गई।
संजय वहां से निकला, उसे पटरी पर लेटा देखकर, "आप आत्महत्या क्यूं कर रही है ??
आक्षी सारी बात बताती है और कहती है, अब किस मुंह से घर जाउंगी ?
संजय उसे समझाता है कि उसे इस तरह के प्यार पर विश्वास नहीं करना चाहिए था, जो इन्सान चन्द दिन पहले मिला, उसके लिए मां- बाप को छोड़ देना बेवकूफी है ।
ऐसे फेसबुकिया प्यार कभी सच्चे नहीं होते, इन पर इतनी जल्दी विश्वास नहीं करना चाहिए ।
संजय आक्षी को घर छोड़ने जाता है, आक्षी के माता-पिता, बेटी को गले लगाते है, और संजय का शुक्रिया करते हैं "" थैंक्यू बेटा तुमने हमारी इज़्ज़त बचा ली। हमारी बेटी की जान बचाकर हम पर बहुत बड़ा एहसान किया है । और इस तरह उसे ढेर सारी दुआएं देते हैं" ।

मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर )

ये है प्यार की इंतेहा-प्रेम बजाज




दिल्ली शहर में राहुल एक अच्छे धनी परिवार से संबंध रखता था , शीना साधारण परिवार से थी लेकिन खूबसूरती देखते बनती थी , भरा-पूरा बदन , गोरा - चिट्टा रंग , तीखे नैन-नक्श , जो देखे तो पलक झपकना भूल जाए ।
राहुल भी ऊंचे कद-काठी का चौड़ा सीना , गेहुंआ रंग , जचता था , उस पर पैसे का घमण्ड तो तू भी नही गया ।
दोनों में अच्छी दोस्ती थी , ना जाने कब ये दोस्ती प्यार में बदल गई ।

# बढ़ जाए त्रिश्नगी जब हद से तो जां पर बन आती है
छलकते है लबों के जाम तो प्यास और बढ़ जाती है #
इसी तरह जोश-ए-जवानी ने वो काम किया , एक तुफ़ान आया और सबकुछ बहा कर ले गया ।
राहुल बहुत ग़लत हुआ , शादी से पहले ये ठीक नहीं ।
शीना मैं जानता हूं हमसे गलती हो गई , लेकिन हमारा प्यार सच्चा है , हमें किस बात का डर ।
मैं आज ही अपने मम्मी-पापा को तुम्हारे घर भेजता हूं हमारी शादी की बात करने के लिए ।
लेकिन एक सप्ताह बाद तो तुम अमेरिका जा रहे हो ।
तुम टेंशन मत लो जाने से पहले हमारी शादी हो जाएगी , हम बिल्कुल सिंपल सी शादी करेंगे और जब मैं वापिस आ जाऊंगा फिर हम एक फंक्शन कर लेंगे ‌।
राहुल के मम्मी-पापा शीना के घर जाकर बात करते हैं ,जब शादी की तारीख निकलवाने के लिए पंडित के पास गए तो पंडित ने बताया कि 6 महीने तक शादी का मुहूर्त नहीं । दोनों मन मार कर रह जाते हैं ।
राहुल एक सप्ताह बाद अमेरिका चला गया अपनी काम के सिलसिले में , इधर शीना भी अपनी नौकरी में व्यस्त है । दो महीने बाद शीना को पता चलता है कि वे मां बनने वाली है । राहुल के मम्मी-पापा को बताया जाता है तो वो मानने से इंकार कर देते हैं कि राहुल ही इस बच्चे का पिता है , और वो रिश्ते से भी इन्कार कर देते हैं ।
शीना अपने प्यार को मारना नहीं चाहती इसलिए वो दिल्ली छोड़कर मुम्बई चली जाती है और एक प्यारी सी गुड़िया को जन्म देती है ‌।
उधर राहुल को उसके मम्मी-पापा बताते हैं कि शीना इंतजार नहीं कर सकी और शादी कर ली ‌।
शीना की ज़िंदगी ख़राब ना हो इसलिए राहुल उससे कभी बात नहीं करता । शीना भी राहुल की शादी की बात सच मान कर राहुल को फोन नहीं करती । लेकिन दोनों को विश्वास है कि एक दिन वो ज़रूर मिलेंगे और जानना चाहेंगे कि क्यों किया ऐसा ।
शीना बेटी का नाम राशी , अर्थात दोनों का नाम जोड़ कर ( राहुल +शीना ) रखती है , वह अपनी बेटी में राहुल की झलक देख कर जी रही है कि अचानक शीना बीमार हो जाती है , पता चलता है कि शीना को ब्लड कैंसर है , दस साल की बेटी , कोई रास्ता नहीं तो दिल्ली वापिस मां- पापा के पास आ जाती है ‌।
राहुल इंडिया वापिस नहीं आना चाहता था , लेकिन उसके पापा बहुत बीमार हो गए ,और वो मिलने आ रहा है और रास्ते में क्या देखता है कि शाम का समय एक 15 साल की खूबसूरत लड़की जिसे दो लड़कों ने घेरा है और वो डंक कर उनका मुकाबला कर रही है ।
राहुल ये देख कर प्रभावित होता है ।
बहुत बढ़िया बेटा , ऐसे लोगों कि यही हश्र होना चाहिए , हम तो आप की बहादुरी के कायल हो गए बेटा , क्या हम आप के मम्मी-पापा से मिल सकते हैं , आप को घर भी छोड़ देंगे ।
राहुल राशी को घर छोड़ने जाता है तो शीना को देख अवाक रह जाता है ‌, और वहीं पर ही शीना के माता-पिता से पता चलता है कि राशी राहुल की ही बेटी है और शीना के कैंसर का भी पता चलता है ।
शीना मैं तुम्हारा गुनाहगार हूं , मुझे लगा सचमुच तुमने शादी कर ली , और तुम्हारी ज़िन्दगी में कोई बवाल ना हो , इसलिए ना तो तुम्हारे फोन का जवाब दिया , और ना ही मैंने फोन किया । लेकिन अब नहीं , चलो अपने घर ।
राहुल शीना की मांग भरता है और घर ले आता है । और माता- पिता को समझाता है कि शीना और राशी ही उसकी ज़िंदगी हैं । राहुल के माता-पिता समझ जाते हैं और उन्हें भी अपनी गलती का एहसास होता है । राहुल के पापा अब ठीक हो गए हैं , और सब मिलजुल कर अच्छे से रह रहे हैं की अचानक शीना की तबीयत बिगड़ जाती है , और डाक्टर बता देते हैं कि शीना का आखिरी समय आ गया है , लगभग एक सप्ताह के पश्चात शीना राहुल की गोद में अंतिम सांसें लेते हुए विदा हो जाती है , लेकिन उसके चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कुराहट होती है । कि उसने राहुल की अमानत उसे सोंप दी , और साथ ही साथ उसके इंतजार का भी अंत हुआ , आज वो अपने प्यार की बाहों में आखिरी सांस ले रही है । यही होती है प्यार की इंतहा ।


मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर )

Sunday, November 22, 2020

रिश्तों की अहमियत-प्रेम बजाज




मात-पिता के रिश्ते की जो ना जाने कद्र वो कुलांगार है ,
सच्चा रिश्ता वो होता है जो रिश्तों की माला करता कण्ठागार है ,
रिश्तों को रखें उलझाए हर पल जो वो रिश्तों का कसूरवार है ,
कभी हद से बढ़ जाती उलझन रिश्तों में तो लगता कारागार है।

रिश्तों को निभाना होता है दिल से यहां ना कोई रिश्तों का कामगार है ,
जब कूट- कूट भरा होता है प्यार- विश्वास वहां दिल बनता रिश्तों का ओगार है ,
ना उलझनें देना कभी रिश्तों को , ये रिश्ते खुशी के तलबगार है,
जो सींचे प्यार के पानी से रिश्ते के पौधे वो ही करूणागार है ।

जो ना समझो पाया अहमियत रिश्तों की उसका जीवन कगार है,
वो रहता ताउम्र जिंदगी से शर्मसार है,
इन प्यारे-प्यारे रिश्तों से मुंह मोड़ना तो बेकार है,
परवरदिगार ने बक्शे हैं ये प्यारे रिश्ते इन्हें निभाने वाले हम तो बस किरदार हैं।


मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर )

Saturday, November 21, 2020

संडे स्पेशल कहानी-चिन्ता



           
एक राजा की पुत्री के मन में वैराग्य की भावनाएं थीं। जब राजकुमारी विवाह योग्य हुई तो राजा को उसके विवाह के लिए योग्य वर नहीं मिल पा रहा था।

राजा ने पुत्री की भावनाओं को समझते हुए बहुत सोच-विचार करके उसका विवाह एक गरीब संन्यासी से करवा दिया। राजा ने सोचा कि एक संन्यासी ही राजकुमारी की भावनाओं की कद्र कर सकता है।

विवाह के बाद राजकुमारी खुशी-खुशी संन्यासी की कुटिया में रहने आ गई। कुटिया की सफाई करते समय राजकुमारी को एक बर्तन में दो सूखी रोटियां दिखाई दीं। उसने अपने संन्यासी पति से पूछा कि रोटियां यहां क्यों रखी हैं? संन्यासी ने जवाब दिया कि ये रोटियां कल के लिए रखी हैं, अगर कल खाना नहीं मिला तो हम एक-एक रोटी खा लेंगे। संन्यासी का ये जवाब सुनकर राजकुमारी हंस पड़ी। राजकुमारी ने कहा कि मेरे पिता ने मेरा विवाह आपके साथ इसलिए किया था, क्योंकि उन्हें ये लगता है कि आप भी मेरी ही तरह वैरागी हैं, आप तो सिर्फ भक्ति करते हैं और कल की चिंता करते हैं।

सच्चा भक्त वही है जो कल की चिंता नहीं करता और भगवान पर पूरा भरोसा करता है। अगले दिन की चिंता तो जानवर भी नहीं करते हैं, हम तो इंसान हैं। अगर भगवान चाहेगा तो हमें खाना मिल जाएगा और नहीं मिलेगा तो रातभर आनंद से प्रार्थना करेंगे।

ये बातें सुनकर संन्यासी की आंखें खुल गई। उसे समझ आ गया कि उसकी पत्नी ही असली संन्यासी है। उसने राजकुमारी से कहा कि आप तो राजा की बेटी हैं, राजमहल छोड़कर मेरी छोटी सी कुटिया में आई हैं, जबकि मैं तो पहले से ही एक फकीर हूं, फिर भी मुझे कल की चिंता सता रही थी। सिर्फ कहने से ही कोई संन्यासी नहीं होता, संन्यास को जीवन में उतारना पड़ता है। आपने मुझे वैराग्य का महत्व समझा दिया।

अगर हम भगवान की भक्ति करते हैं तो विश्वास भी होना चाहिए कि भगवान हर समय हमारे साथ हैं। उसको (भगवान) हमारी चिंता हमसे ज्यादा रहती हैं।

कभी आप बहुत परेशान हों, कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा हो तो आप आँखें बंद करके विश्वास के साथ उस परमात्मा को पुकारें जिसने आपको यह सुन्दर मनुष्य जीवन दिया है, सच मानिये थोड़ी देर में आपकी समस्या का समाधान मिल जायेगा।


Thursday, November 19, 2020

सुहाग ज़िन्दा रहे , वहीं असली मंगलसूत्र-प्रेम बजाज

धन-लक्ष्मी



रीटा के ससुर को अचानक रात को छाती में दर्द हुआ , डाक्टर के पास जाने पर पता चला कि सिरियस हार्ट अटैक है , और सर्जरी होगी वो भी दिल्ली जाना होगा , जिस के लिए लगभग तीन लाख रूपए का खर्च होगा ।
रीटा के पति अकेले बेटे हैं किसी और का सहारा भी नहीं और उन दिनों लेबर की स्ट्राइक के चलते काम पे भी काफी बुरा असर पड़ रहा था ।
सर्जरी भी जरूरी , उनकी जान को ख़तरा था , लेकिन इतने पैसे कहां से आए , रीटा के पति राहुल ने डाक्टर को तो सर्जरी के लिए कह दिया लेकिन बहुत परेशान थे ।
बोले किसी दोस्त से करता हूं बात अगर कोई उधार दे दे तो , रीटा की सास बोली मेरा मंगलसूत्र सैट के अलावा कोई गहना नहीं मेरे पास , वहीं ले जाकर बेच दो , सुहाग ज़िन्दा रहे , वहीं असली मंगलसूत्र है।
रीटा ने उसी समय अपने पति के हाथ पर एक एफ. डी. दो लाख की और अपनी पासबुक जिसमें लगभग सत्तर- अस्सी हजार रुपए थे , पकड़ा दी।
रीटा का पति और सास उसे बड़ी हैरानी से देख रहे थे कि इतने पैसे वो कहां से लाई ?
वो बस इतना कह पाई कि "" ये मेरी बचत है ।
मम्मी जी ने उस समय उसे गले से लगा लिया, और बोली बेटी मुझे क्षमा करना , तुम हर महीने जब भी पहली तारीख को बजट बनाने लगती थी तो हर बार मैं तुम्हें यही बोलती थी कि ना जाने ये क्या बही- खाते लेकर बैठ जाती है ,इससे क्या होगा , जो है खर्च करो हिसाब- किताब क्या लिखना ।
और तुम हर बार यही कहती ... मम्मी जी बजट बनाकर चलना चाहिए ,और आने वाले बुरे या अच्छे समय के लिए कुछ ना कुछ सेविंग अवश्य होनी चाहिए , तुम सही कहती थी।
तुम तो सचमुच मेरी आज धन- लक्ष्मी बन गई।
आज से मैं तुम्हें धन- लक्ष्मी ही कहूंगी।


मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर )

गर्ल चाइल्ड डे-प्रेम बजाज

सुनो-सुनो ए भारत की नारी , नहींं रही अब तु बेचारी क्यों जन्म से पहले ही कोख में बेटी को मार जाता है । तुम भी तो एक बेटी हो तभी गर्भ धारण ...